How MS Dhoni become most successful Indian Captain

महेंद्र सिंह धोनी, क्रिकेट की दुनिया में ऐसा नाम है जिसे शायद ही कोई ना पहचानता हो। धोनी ने टीम इंडिया में अपनी जगह एक विस्फोटक बल्लेबाज के तौर पर बनाई थी लेकिन वक्त के साथ धोनी भारत के सबसे सफल कप्तान बन गए। दबाव भरे हालातों में शांत रहने के कला में माहिर कैप्टन कूल ने टीम इंडिया को एक नहीं बल्कि तीन आईसीसी ट्रॉफी जिताई। आज धोनी के 37वें जन्मदिन पर हम उनके शानदार सफर को जानेंगे।

धोनी को टी-20 में LBW करना मुश्किल, देखिए ये अदभुत रिकॉर्ड
धोनी को टी-20 में LBW करना मुश्किल, देखिए ये अदभुत रिकॉर्ड

साल 2004 में 23 साल के धोनी ने बांग्लादेश के खिलाफ वनडे मैच से भारतीय क्रिकेट टीम में कदम रखा। धोनी पहले मैच में शून्य पर आउट हो गए थे और बाकी दो मैच में भी केवल 19 ही रन बना सके। लेकिन जब पाकिस्तान के खिलाफ में उन्हें मौका मिला तो उन्होंने इसका फायदा उठाया और विशाखापत्तनम के मैदान पर 148 रनों का धमाकेदार पारी खेली। 2004 से 2006 तक धोनी ने भारतीय टीम के लिए 59 वनडे मैच खेले और कुल 1735 रन बनाए, जिसमें श्रीलंका के खिलाफ बनाई 183 रनों की शानदार पारी भी शामिल है।

2007 टी20 विश्व कप

धोनी को असली चुनौती तब मिली जब साल 2007 में उन्हें एक युवा और गैर अनुभवी टीम के साथ पहला टी20 विश्व कप खेलने दक्षिण अफ्रीका भेज दिया गया। टीम इंडिया ने विश्व कप से पहले केवल एक ही टी20 मैच खेला था, ऐसे में ये टूर्नामेंट भारत के लिए एकदम नया था। टी20 विश्व कप में टीम इंडिया का गेंदबाजी अटैक आर पी सिंह और इरफान पठान ने संभाला, वहीं बल्लेबाजी में गौतम गंभीर ने टीम को नेतृत्व किया। स्कॉटलैंड के खिलाफ पहला मैच रद्द होने के बाद टीम इंडिया ने पाकिस्तान के खिलाफ मैच ड्रॉ किया। जहां फैसला बॉल आउट से हुआ और भारतीय टीम ने जीत दर्ज की। न्यूजीलैंड के खिलाफ मैच में हारने के बाद टीम इंडिया ने इंग्लैंड और फिर सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में जगह बनाई।

फाइनल में भारत का सामना पाकिस्तान से होना था। जोहान्सबर्ग में खेले गए इस मैच में टीम इंडिया ने गंभीर के 75 रनों की पारी की मदद से पाक टीम को 158 रनों का लक्ष्य दिया था। मिसबाल उल हक की 43 रनों की शानदार पारी पाकिस्तान को जीत के बेहद करीब ले आई थी। आखिरी ओवर में 13 रनों की जरूरत थी औऱ धोनी ने किसी सीनियर खिलाड़ी के बजाय जोगिंदर शर्मा को गेंद थमा दी। ओवर की पहली गेंद वाइड रही और दूसरी गेंद पर मिसबाह ने छक्का जड़ दिया। लेकिन अगली गेंद पर स्कूप शॉट लगाने की कोशिश में मिसबाह श्रीसंत को कैच थमा बैठे और भारत ने पहला टी20 विश्व कप अपने नाम किया। पहली बार टीम इंडिया की कप्तानी कर रहे धोनी ने अपने पहले ही टूर्नामेंट में जीत हासिल की लेकिन कैप्टन कूल का ट्रॉफी कलेक्शन तो अभी शुरू हुआ था।

2011 वनडे विश्व कप

बतौर खिलाड़ी धोनी ने पहला वनडे विश्व साल 2007 में खेला। राहुल द्रविड़ की कप्तानी में वेस्टइंडीज गई टीम इंडिया का सफर केवल तीन मैचों के बाद ही खत्म हो गया। 2007 विश्व कप से शर्मिंदा होकर लौटी टीम इंडिया में कई बदलाव हुए और कप्तानी धोनी को सौंप दी गई। बतौर कप्तान धोनी को पहला वनडे विश्व कप खेलने का मौका 2011 में मिला। भारत में आयोजित होने की वजह से फैंस की उम्मीदें और भी बढ़ गई थी लेकिन विश्व कप का ये रिकॉर्ड था कि कोई टीम अपने घर में ट्रॉफी नहीं जीत पाई है। धोनी ने इस रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया। पहले मैच में बांग्लादेश के 87 रनों से हराकर भारत ने 2007 विश्व कप की शर्मनाक हार का बदला लिया। इसके बाद टीम इंडिया ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। युवराज सिंह, गंभीर और विरेंद्र सहवाग ने विपक्षी बल्लेबाजों पर कहर ढाया हुआ था। वहीं अपना आखिरी विश्व कप खेल रहे सचिन तेंदुलकर का बल्ला भी जमकर बोल रहा था। गेंदबाजी अटैक की अगुवाई सीनियर तेज गेंदबाज जहीर खान कर रहे थे। भारतीय टीम ने 6 में 4 लीग मैच जीतकर ग्रुप बी में दूसरे नंबर पर जगह बना ली थी। सेमीफाइनल मैच भारत और चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान के बीच खेला जाना था। मोहाली में हुए इस मैच को देखने हजारों दर्शकों के साथ दोनों देशों के प्रधानमंत्री भी पहुंचे थे। मास्टर ब्लास्टर की 85 रनों की पारी और गेंदबाजों के साझे प्रयास की बदौलत भारतीय टीम ने पाकिस्तान को हरा फाइनल में जगह पक्की की।

मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेले गए इस मैच में श्रीलंकाई बल्लेबाज महेला जयवर्धने ने तूफानी शतक लगाया और भारतीय फैंस की धड़कने बढ़ा दी। भारत के सामने जीत के लिए 275 रनों का लक्ष्य था। लक्ष्य का पीछा करने उतरे टीम इंडिया ने पहले ही ओवर सहवाग का विकेट खो दिया। सचिन-गंभीर ने पारी को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन लसिथ मलिंगा ने तेंदुलकर को आउट कर पूरे स्टेडियम को खामोश कर दिया। इसके बाद कोहली और गंभीर ने भारतीय टीम की उम्मीदे जगाई। 22वें ओवर में कोहली दिलशान के ओवर में आउट हुए। 114 पर तीन बड़े विकेट खोने के बाद टीम को टूर्नामेंट में अपने सबसे सफल बल्लेबाज की जरूरत थी। सभी को उम्मीद थी कि युवराज नीचे उतरेंगे लेकिन एक बार फिर धोनी ने चौंकाने वाला फैसला लिया और बैट लेकर खुद मैदान में उतरे। बतौर बल्लेबाज धोनी के लिए टूर्नामेंट कुछ खास नहीं रहा था, ऐसे में उनका ये फैसला गलत साबित हो सकता था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। धोनी ने 79 गेंदो पर 91 रनों की मैचविनिंग पारी खेली और आखिरी गेंद पर छक्का लगाकर भारतीय टीम का 28 साल पुराना सपना पूरा किया।

2013 चैंपियंस ट्रॉफी

अपने कैबिनेट में दो विश्व कप ट्रॉफी जमा करने के बाद धोनी की नजर चैंपियंस ट्रॉफी कर थी। 2011 विश्व कप के दो साल बाद धोनी को ये मौका मिला, जब टीम इंडिया चैंपियंस ट्रॉफी खेलने इंग्लैंड पहुंची। चैंपियंस ट्ऱॉफी में भारत की सलामी जोड़ी रोहित शर्मा और शिखर धवन ने धमाल मचाया था। इसके पीछे रोहित को ऊपरी क्रम में खिलाने का धोनी का फैसला था। बल्लेबाजी में जहां रोहित-धवन छाए थे, वहीं गेंदबाजी का जिम्मा सर रविंद्र जडेजा और ईशांत शर्मा ने संभाला था। पूरे टूर्नामेंट में अच्छी बल्लेबाजी कर रही टीम इंडिया ने फाइनल मैच में के वल 129/7 का स्कोर बनाया।

हालांकि अश्विन और ईशांत ने इंग्लिश बल्लेबाजों के लिए 130 के मामूली लक्ष्य को भी मुश्लिक बना दिया। फाइनल मैच के आखिरी ओवर में इंग्लैंड को जीत के लिए 15 रन चाहिए थे और धोनी ने गेंद अश्विन को थमाई। पहली गेंद डॉट रही लेकिन अगली गेंद पर स्टुअर्ट ब्रॉड ने चौका लगाया। अगली तीन गेंदो पर कुल पांच रन आए। आखिरी गेंद पर जीत के लिए 6 रनों की जरूरत थी और अश्विन ने बल्लेबाज को लेंथ से बीट किया। आखिरी गेंद पर कोई रन नहीं आया और टीम इंडिया ने चैंपियंस ट्रॉफी पर कब्जा किया। इसी के साथ धोनी तीन आईसीसी ट्रॉफी जीतने वाले दुनिया के अकेले कप्तान बन गए।