ये पांच कारण बताएंगे कि क्यों भारतीय फैन्स एमएस धोनी से नफरत करते हैं
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एमएस धोनी शायद दुनिया के एकमात्र ऐसे क्रिकेटर होंगे जिन्हें लोग जितना पसंद करते हैं उससे ज्यादा उन्हें नफरत करने वाले भी हैं। लेकिन मोहब्बत और नफरत का समीकरण भारत के सफलतम कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की राह में कैसा आ गया? ऐसा क्या हुआ की 2007 टी20 विश्व कप और 2011 विश्व कप दिलाने वाले कप्तान एमएस धोनी क्रिकेट फैन्स की आंखों की किरकिरी बन गए। आइए जानते हैं कि आखिर धोनी क्यों हैं लोगों की नफरत के हासिए पर।

1. सीनियरों खिलाड़ियों को बाहर करने में धोनी की कूटनीति:

5 Reasons why do Indian Fans hate MS Dhoni
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साल 2007 में एमएस धोनी टीम इंडिया के कप्तान बने और इसके बाद से घरेलू क्रिकेट से कई युवाओं को जमकर मौका दिया गया। लेकिन इसी बीच गाज सीनियर खिलाड़ियों पर गिरी और उनके खराब प्रदर्शन के मद्देनजर उन्हें आगे के सालों में बिना कौताही के बगैर टीम से बाहर का रास्ता दिखा गया। साल 2007 में धोनी के कप्तान बनने के बाद सचिन तेंदुलकर को छोड़कर बाकी सीनियरों(राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली) को टीम से बाहर का रास्ता देखना पड़ा।

ये सिलसिला यही नहीं थमा। साल 2011 में भारत की विश्व कप जीत के बाद दूसरे सीनियर खिलाड़ियों वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, जहीर खान, हरभजन सिंह और जहीर खान को टीम से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। इनमें से कई खिलाड़ियों को तो घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद टीम इंडिया में धोनी की कूटनीति की वजह से शामिल होने का मौका नहीं मिला। इसके उलट टीम में युवा खिलाड़ियों को मौका दिया गया जिन्होंने अपनी प्रतिभा को आईपीएल के सहारे न्यायसंगत ठहराते हुए टीम में अपना स्थान पुख्ता किया।

2. विदेशी धरती पर बतौर टेस्ट कप्तान धोनी साबित हुए फिसड्डी:

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साल 2008 में जब अनिल कुंबले ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहा तो एमएस धोनी को टेस्ट क्रिकेट का भी कप्तान बना दिया गया। चूंकि, उसके पहले धोनी ने सीमित ओवर की क्रिकेट में अपनी अच्छी छवि बना ली थी। इसलिए उनसे कुछ अलग करने की उम्मीद की जा रही थी। धोनी ने घरेलू मैदान पर तो बड़ी- बड़ी टीमों को धूल चटाने में सफलता अर्जित की और टेस्ट रैंकिंग में नंबर एक का तमगा भी हासिल कर लिया।

लेकिन अभी तो बुरे दिन आने बाकी थे। साल 2011 के बाद टीम इंडिया ने कई विदेशी दौरे किए और टेस्ट सीरीज खेली, लेकिन धोनी इन सबमें फिसड्डी साबित हुए। पिछले 5 सालों में धोनी विदेशी धरती पर एक भी टेस्ट मैच जिताने में कामयाब नहीं हो पाए। यही कारण रहा कि धोनी ने साल 2014 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में 4-0 की हार के बाद टेस्ट कप्तानी से किनारा करने का फैसला किया। लेकिन इसके बावजूद उनसे नफरत करने वालों का गुस्सा जस का तस रहा।

3. अंतरराष्ट्रीय टीम में चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाड़ियों को वरीयता देना:

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एमएस धोनी पर समय- समय पर आरोप लगते रहे हैं कि वह अक्सर टीम इंडिया के सिलेक्शन में अपनी आईपीएल टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाड़ियों को वरीयता देते हैं। भले ही आज चेन्नई सुपरकिंग्स टीम अब अगले दो सालों के लिए निलंबित हो गई हो, लेकिन धोनी का रवैया अभी भी लोगों के शक के घेरे में है।

4. कुछ खिलाड़ियों पर हद से ज्यादा भरोसा:

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एमएस धोनी को उनके अजीबोगरीब निर्णयों के लिए जाना जाता है। कई बार वह ऐसे खिलाड़ियों के साथ भी खड़े हो जाते हैं जो बेहद खराब फॉर्म से गुजर रहे होते हैं। जिसके कारण भी वह लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाते हैं। अब आप साल 2012-13 सीजन को ही ले लीजिए।

इस समय रोहित शर्मा बेहद खराब फॉर्म से गुजर रहे थे और न्यायसंगत तो ये था कि रोहित को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि धोनी ने रोहित पर भरोसा जताया और उन्हें ओपनिंग बैटिंग करने के लिए भेजा। हालांकि रोहित ने बाद में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जरूर अपनी फॉर्म में वापसी कर ली।

लेकिन रोहित को हद से ज्यादा मौके देने पर उनकी खूब निंदा हुई। वही बात रविंद्र जडेजा के साथ लागू हुई। जब धोनी ने साल 2014 में उनकी खराब फॉर्म के बावजूद उन्हें जमकर मौके दिए। यही नहीं उन्होंने अश्विन को अंतिम एकादश के बाहर बिठाकर भी जडेजा को टीम में जगह दी। यह बात कई लोगों को नागवार गुजरी।

5. धोनी का फिनिशर वाले गुण का एकदम से खत्म होना:

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एमएस धोनी के करियर में एक दौर था कि अगर वह बल्लेबाजी के लिए आ गए हैं तो वह मैच जितवा के ही जाएंगे। यही कारण है कि उन्हें माइकल बेवन से भी अच्छा फिनिशर माना जाने लगा था। लेकिन पिछले कुछ सालों से धोनी के बल्ले से ना ही उतनी तेजी से रन निकल रहे हैं और ना ही वह मैच को अंतिम स्टेज पर ले जाकर खत्म कर पा रहे हैं। जाहिर है कि लोगों को धोनी का लगातार जूझना कतई पसंद नहीं आ रहा है।