अब्दुल हफीज करदार © Getty Images
अब्दुल हफीज करदार © Getty Images

आपने ऐसे कई क्रिकेटरों के बारे में सुना होगा जिन्होंने दो देशों के लिए क्रिकेट खेली। जिनके नाम ईयोग मॉर्गन, डिर्क नैनेस आदि हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान टीम के कई खिलाड़ी भारतीय टीम की ओर से खेले। अगर आप चौंक रहे हैं तो आपका चौंकना भी वाजिब है। लेकिन आपको बता दें कि यह बात स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले की है जब भारत और पाकिस्तान एक देश हुआ करते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत और पाकिस्तान दो मुल्कों में बंट गए और इस तरह पाकिस्तान की क्रिकेट टीम भी अलग टीम बनी। इस नई पाकिस्तान टीम के कप्तान अब्दुल हफीज करदार बने जो पहले ही भारतीय क्रिकेट टीम की ओर से टेस्ट मैच खेल चुके थे। करदार ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज साल 1946 में किया था जब वह भारतीय टीम की ओर से इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स के  मैदान पर खेले थे। हफीज ने इस मैच की पहली पारी में 43 और दूसरी पारी में शून्य रन बनाए थे। पाकिस्तान क्रिकेट के पहले कप्तान हफीज करदार अच्छे पढ़े लिखे क्रिकेटर थे। उन्होंने ग्रेजुएशन इंग्लैंड की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से किया था। ये भी पढ़ें: क्रिकेट का नया सुपरस्टार ए बी डीविलियर्स

पाकिस्तान को साल 1952 में टेस्ट दर्जा प्राप्त हुआ और हफीज ने पाकिस्तानी टीम की बागडोर साल 1952 से 1958 तक संभाली। जिस समय हफीज ने टीम की बागडोर संभाली उस समय पाकिस्तान क्रिकेट की माली हालत बेहद खराब थी। यहां तक की टीम के खिलाड़ियों के पास ढंग की क्रिकेट किट भी नहीं थी। वे अपनी किट की जरूरतें अपने दोस्तों व फैन्स से मांगकर पूरी करते थे। यहां तक की जूते भी उनके दोस्त उन्हें उधार देते थे। इस सबके बावजूद हफीज ने अपनी कप्तानी की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। पाकिस्तान ने हफीज की कप्तानी में 23 मैच खेले जिनमें 8 में जीत दर्ज की। यह उस टीम के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी जिसके खिलाड़ी गरीबी में गड़े हुए थे।

हफीज का सबसे बड़ा हथियार जिद्दी सलामी बल्लेबाज हनीफ मुहम्मद और असाधारण स्विंग गेंदबाज फैजल मेहमूद थे। इन्हीं रणबांकुरों के सहारे पाकिस्तान ने कैरेबियाई देश वेस्टइंडीज का पहला दौरा किया। पाकिस्तान पहली बार बिल्कुल भिन्न क्रिकेट पिच पर बल्लेबाजी कर रहा था, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान टीम ने कैरेबियाई टीम को जमकर टक्कर दी।

अंततः पाकिस्तान सीरीज 3-1 से हार गया। लेकिन हफीज की कप्तानी में पाकिस्तान ने हर टेस्ट खेलने वाले देश के खिलाफ टेस्ट मैच जीता जो उस समय विश्व पटल में उभर रही पाकिस्तान टीम के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। हलांकि दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ उनका सामना नहीं हुआ क्योंकि दक्षिण अफ्रीका उस समय गैर-श्वेत देश के खिलाफ क्रिकेट नहीं खेलता था। वेस्टइंडीज के दौरे के बाद हफीज ने मात्र 33 साल की उम्र में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने का फैसला कर दिया।

साल 1960 में हफीज पाकिस्तान के तेजतर्रार राजनेता जुल्फिकार अली भुट्टो के संपर्क में आए और उन्होंने उनकी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी(पीपीपी) ज्वाइन कर ली। साल 1970 में पीपीपी सत्ता में आई और उसके दो साल के बाद साल 1972 में हफीज को पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। हफीज के 1958 में संन्यास लेने के बाद पाकिस्तान क्रिकेट एक दम से अपनी चमक खोने लगा। 1960 के दशक में टीम ने 33 टेस्ट मैच खेले, लेकिन उन्हें मात्र 2 टेस्ट मैचों में जीत नसीब हो पाई। हार से परेशान पाकिस्तान टीम ने 6 कप्तान बदले, लेकिन परिणाम जस का तस रहा।

तब भुट्टो ने खुद हफीज को क्रिकेट बोर्ड का मुखिया बनकर पाकिस्तान क्रिकेट को पुर्नजीवित करने की जिम्मेदारी दी। अपने हठी रवैए के लिए प्रसिद्ध हफीज ने बोर्ड के प्रेसीडेंट के रूप में शामिल होकर कुछ इस तरह का माहौल बनाया कि वह खुद टीम से बड़े लगने लगे। वह नए खिलाड़ियों को जगह देने में ज्यादा यकीन रखते थे। उनकी ही कप्तानी में इमरान खान, सरफराज खान, वसीम रजा, और जावेद मियांदाद जैसे बेहतरीन क्रिकेटरों ने पाकिस्तान क्रिकेट को नई दिशा दी।

हालांकि उन्होंने अनुभवी क्रिकेटर इंतिखाब आलम को साल 1975 तक पाकिस्तान टीम का कप्तान बनाए रखा। लेकिन उन्होंने साल 1976 में यह महसूस किया कि जिस तरह की वह अपने खिलाड़ियों से उम्मीद लगा रहे हैं उसके मुताबिक वह प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। इसीलिए उन्होंने इंतिखाब को कप्तानी से बर्खास्त करते हुए गुस्सैल स्वभाव के मुश्ताक मोहम्मद को नया कप्तान बनाया।

मुश्ताक के भाई हनीफ मोहम्मद, हफीज की कप्तानी में खेले थे। इसीलिए वह सोचते थे कि मुश्ताक भी हनीफ की तरह उनकी बातों को मानेगा। लेकिन न्यूजीलैंड सीरीज के दौरान मुश्ताक ने हफीज का विरोध किया जिससे हफीज को एक बड़ा झटका लगा। हफीज ने उसके बड़े भाई हनीफ से इस संबंध में बातचीत की और कहा कि वह अपने छोटे भाई के दिमाग में सही बातें डाले। लेकिन फिर भी मुश्ताक नहीं माने और वह हफीज का लगातार विरोध करते रहे।

मुश्ताक ने इस दौरान अपने टीम के खिलाड़ियों की वेतन बढ़ाने को कहा लेकिन हफीज ने इस बात को नकार दिया। यहां तक की हफीज ने मुश्ताक को कप्तानी से हटाने की धमकी दे डाली और कहा कि वह फिर से इंतिखाब को कप्तान बना देंगे। उन्होंने पाकिस्तान के ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज के दोहरे दोरे के पहले ऐसा ही किया और इस दौरे से मुश्ताक और उनके साथियों आसिफ इकबाल, माजिद, इमरान खान, और सरफराज खान को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

इस दौरे के लिए एक बेहद जुदा पाकिस्तान टीम का चुनाव किया गया। इसके पहले हैदराबाद में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले गए टेस्ट मैच के पहले हफीज ने 11- प्रथम श्रेणी खिलाड़ियों की टोली को बुलवा लिया था। ताकि अगर पाकिस्तानी खिलाड़ी पेमेंट मुद्दे को लेकर बवाल मचाए तो उनकी जगह प्रथम श्रेणी क्रिकेटरों को खिला दिया जाएगा। टॉस तक पाकिस्तान क्रिकेट टीम के ड्रेसिंग रूम में 25 खिलाड़ी थे। इसी बीच भुट्टो के शासनकाल के कानून मंत्री हफीज पीरजादा ने हस्तक्षेप किया और मुश्ताक की मांगें मानने पर सहमत हो गए ।

लेकिन यह बात हफीज के सीने में गड़ गई और उन्होंने इस्तीफा देने का मन बना लिया। लेकिन जैसे तैसे भुट्टो ने उन्हें मना लिया। बाद में साल 1977 में पाकिस्तान में जनरन जिया-हक के नेतृत्व में तख्ता-पलट हुआ और उन्हें बोर्ड के प्रेजीडेंट के पद से हटा दिया गया। उन्होंने साल 1980 में पीपीपी पार्टी को अलविदा कह दिया और उसके बाद वह अपनी रिटायर्ड जिंदगी बिताने लगे।

जब पाकिस्तान ने बैंगलोर में हुए एक करीबी टेस्ट में भारत को हरा दिया तो हफीज अपने भावों को छुपा नहीं पाए और लाइव टेलीवीजन में बोल पड़े, ‘हमने हिंदुों को उनकी ही सरजमीं पर हरा दिया…हमने हिंदुओं पर फतह हासिल कर ली।’ उनके इस बयान पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रियां दीं कि हफीज सठिया गए हैं। साल 1996 में उनके होमटाउन लाहौर में उनका निधन हो गया। वह उस वक्त 71 साल के थे।