माइकल हसी  © Getty Images
माइक हसी © Getty Images

अगर आप ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के 128 साल पुराने इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो आपको उनकी बल्लेबाजी तकनीकि के कई पहलुओं के बारे में जानकारी मिलेगी। शुरू से ही ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बैटिंग करने के दौरान बैट को जमीन पर रखते थे और धीरे-धीरे बैट को जमीन पर मारते हुए ठप-ठप करते थे। वह बैट को तब ही हवा में उठाते थे जब गेंदबाज अपनी गेंद फेंकने के लिए उछलता था। अगर 1990 से 2000 के बीच की बात करें तो ऑस्ट्रेलिया के टॉप 7 खिलाड़ी में से हर एक खिलाड़ी एक बैटिंग स्टाइल का आदी था ये टॉप 7 खिलाड़ी मैथ्यू हेडेन, माइकल स्लेटर/जस्टिन लेंगर, रिकी पोंटिग, मार्क वॉ, स्टीव वॉ, डेमियम मार्टिन और एडम गिलक्रिस्ट हैं। ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों को इस बल्लेबाजी तकनीकि से मदद भी मिली और वे विश्व क्रिकेट के बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार हो गए। हालांकि इस दौरान बैटिंग करने की एक और तकनीकि विकसित हुई जिसमें बल्ले को घुटने की ऊंचाई तक पकड़े हुए बल्लेबाज बैटिंग करते थे। लेकिन ग्रेग चैपल व अन्य क्रिकेटरों ने इस तकनीकि को अपनी सहमित नहीं दी और परंपरागत तकनीकि को ज्यादा असरदार माना।

लेकिन ऑस्ट्रेलिया के माइक हसी के क्रिकेट करियर ने एक बार फिर से इस नई बल्लेबाजी तकनीकि को विश्व क्रिकेट में लाकर खड़ा कर दिया और कुछ ही दिनों में 21वीं सदी के धुरंधर बल्लेबाजों की यह नई तकनीकी पसंदीदा बन गई। लेकिन कैसे हुआ ये सब आइए जानते हैं। गजब की प्रतिभा के धनी ऑस्ट्रेलिया के माइक हसी को ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट में प्रवेश बहुत विलंब से मिला। साल 2001 में जब ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को उनकी सरजमीं पर एशेज सीरीज में धूल चटाई तब हसी उस ऑस्ट्रेलियाई टीम के सदस्य नहीं थे। उस समय हसी की उम्र 26 साल थी और वह पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की ओर से सलामी बल्लेबाज के रूप में खेलते थे।

उस साल गर्मियों में हसी ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 30.25 के औसत से रन बनाए। इस दौरान उन्होंने 21 पारियों में मात्र दो अर्धशतक बनाए। लेकिन ऑस्ट्रेलिया टीम में शामिल होने के लिए इतना काफी नहीं था। क्योंकि इस लाइन में उनके आगे साइमन कैटिच, डेरेन लेहमन, स्लेटर, ब्रेड हॉज, मैथ्यू इलियट जैसे खिलाड़ी थे और इन्हें पीछे छोड़कर टीम में जगह बनाने के लिए उन्हें एड़ी चोटी का जोर लगाने की जरूरत थी।

हसी ने एक अंग्रेजी वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में बताया था कि जब वह छोटे थे तब उन्होंने उस समय के बल्लेबाजों को देखा कि वह जमीन में बल्ले को ठोंकते हुए बल्लेबाजी करते थे। उन्होंने कहा कि उस समय के महान बल्लेबाज ग्रेग चैपल और उनके पसंदीदा एलन बॉर्डर भी बल्लेबाजी की इसी तकनीकी में यकीन रखते थे। इसीलिए जब वह क्रिकेटर बने तब उन्होंने भी इसी तकनीकी को अपनाया।

लेकिन शायद ही माइक हसी ने उस समय यह सोचा था कि एक समय आएगा जब वह अपनी बल्लेबाजी तकनीकि में बदलाव करेंगे और उनका वह बदलाव विश्व क्रिकेट में क्रांति लाएगा। जब हसी ने मार्च 2001 में अपना पहला प्रथम श्रेणी शतक बनाया वह तब भी बल्ले को यूं ही जमीन में ठप-ठप करके क्रिकेट खेलते थे। लेकिन इसके कुछ दिनों के बाद उन्हें एहसास हुआ कि अगर वह ऑस्ट्रेलिया की ओर से खेलने वाले सपने को पूरा करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी बल्लेबाजी तकनीकि में परिवर्तन करना पड़ेगा।

क्योंकि इस तरह से बल्ले को जमीन में पटकने से उनका सिर ऑफ साइड की ओर ज्यादा झुक जाता था। इसलिए उनके पैड की ओर आने वाली गेंदों को हिट करने में उन्हें समस्या होती थी और ऐसे में उनके एलबीडब्ल्यू आउट होने की संभावनाए बढ़ जाती थीं। 5 फुट 10 इंच लंबे हसी के पैर काफी लंबे हैं इसलिए उन्होंने बाद के मैचों में लंबे ब्लेड वाले बैट से खेलना शुरू किया ताकि वह अपने आपको ज्यादा अच्छे तरह से बल्लेबाजी के अनुरूप बना सकें। लेकिन इस सबके बावजूद जितनी बार वह बल्ले को जमीन में ठप-ठप करते वह पूरी तरह से ऑफ साइड की ओर झुक जाते जिसकी वजह से बल्लेबाजी करते वक्त उनका बैलेंस खराब हो जाता था।

इस घटना के कुछ महीनों के बाद हसी ने एकाएक अपनी बल्लेबाजी तकनीकि में परिवर्तन किया और अब वह बैट को जमीन में ठप-ठप मारने की बजाय हवा में लिए नजर आए। उनके बैट पकड़ने का अंदाज कुछ ऐसा था जैसे कोई बेस बॉल का खिलाड़ी बल्ले को पकड़े हो। उनका यह बैट घुटनों से ऊपर हवा में था। इस नई बल्लेबाजी तकनीकि ने उन्हें एक बेतहरीन खिलाड़ी बना दिया और अब वह बिना किसी परेशानी के मैदान के चारों ओर स्ट्रोक लगाने लगे। इस घटना के कुछ सालों के बाद ही हसी ने फरवरी 2004 में ऑस्ट्रेलिया की ओर से वनडे क्रिकेट में पर्दापण किया और 2005 में टेस्ट क्रिकेट में पर्दापण किया। अब यहां से हसी को कोई रोकने वाली नहीं था और उन्होंने अपनी बल्लेबाजी से पूरे विश्व को मुरीद बना लिया।

पहले 20 टेस्ट मैच खेलने के बाद उनकी तुलना ग्रेट डॉन ब्रेडमेन से की जाने लगी। इस दौरान उनका रन बनाने का औसत 84.80 था। हसी ने टेस्ट क्रिकेट को साल 2013 में अलविदा कह दिया। अपने संक्षिप्त करियर के दौरान उन्होंने 51.52 के बेहतरीन औसत के साथ 6,235 रन बनाए जिसमें 19 शतक शामिल थे। हसी बैट-अप(बैट को हवा में उठाकर) तकनीकि को सही ढंग से इस्तेमाल करने वाले पहले ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बने।

हसी ने जिस नई तकनीकि को हवा दी उसे आने वाली ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट पीढ़ी ने सहर्ष स्वीकार किया। जब 2015 में ऑस्ट्रेलिया ने 5वां विश्व कप अपने नाम किया तब ऑस्ट्रेलिया के पांच बल्लेबाजों(स्मिथ, फिंच, वॉटसन, ग्लेन मैक्सवेल, जेम्स फॉकनर) ने इस नई नवेली तकनीकि का इस्तेमाल किया। हालांकि ऑस्ट्रेलिया टीम के कप्तान माइकल क्लार्क ने इस तकनीकि को कभी तवज्जो नहीं दी और हमेशा बैट को जमीन में रखकर बल्लेबाजी की। पूर्व ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज ग्रेग चैपल ने भी माना कि यह तकनीकि नई बैटिंग क्रांति है। उन्होंने कहा था कि क्रिकेट के इतिहास में इस तरह से पहले कभी भी बल्लेबाजी नहीं बदली।

मॉर्डन क्रिकेट में बात करें तो माइक हसी की ही तरह भारत के गौतम गंभीर ने भी अपनी बल्लेबाजी की मुद्रा में परिवर्तन किया है।पहले गंभीर का फ्रंट फुट अक्रॉस काफी आगे निकल जाता था, जिसके चलते वो कई बार आउट भी हुए, इससे बचने के लिए उन्होंने यह तरीका अपनाया। नए स्टांस से उनके फुटवर्क में सुधार हुआ है। इसके अलावा नए स्टांस की मदद से वह शॉर्ट बॉल को बेहतर तरीके से खेल सकते हैं।