Bharat Malhotra
Bharat Malhotra अभी cricketcountry.com/hi की टीम की अगुआई कर रहे हैं. भारत के पास डिजिटल मीडिया का 16 साल का अनुभव है. करियर की विधिवत श ...Read More
Written by Bharat Malhotra
Last Updated on - November 25, 2025 4:21 PM IST

युवराज सिंह और केविन पीटरसन का एक वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है. इसमें बाएं हाथ के बल्लेबाज युवराज सिंह 1950 के दशक के बल्ले से खेल रहे हैं. युवी इस बैट से भी लंबे-लंबे शॉट लगा रहे हैं. इसी वीडियो में युवराज यह कहते हैं कि यह बेशक, बेहतर बल्ला है. क्रिकेट के खेल के इस सफर में बल्ले ने कई पड़ाव पार किए हैं. इसका आकार और प्रकार बदला है. इसे इस्तेमाल करने के ढंग में भी बदलाव आए हैं.
1877 वह साल था जब पहली बार अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट खेला गया. इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच. लेकिन क्रिकेट का इतिहास इससे भी पुराना है. पहला रिकॉर्डेड अंतरराष्ट्रीय मैच अमेरिका और कनाडा के बीच हुआ. ये दोनों ब्रिटिश कॉलोनी थीं. और जब से क्रिकेट है तब से बल्ले का सफर है.
सन 1750 में बल्ला अब के बैट से काफी अलग होता था. यह हॉकी और क्रिकेट बैट का एक मेल था. यह चपटा और धारदार होता था. और इसका हैंडल आज के बैट से काफी लंबा होता था. इसके नीचे से चौड़े होने की एक वजह यह भी होती थी कि पहले अंडरआर्म गेंद होती थी. और उस गेंद को हिट करने के लिए बल्ले का नीचे से चौड़ा होना फायदे का सौदा होता था.
क्रिकेट बैट का सबसे पहला जिक्र 1624 के आसपास मिलता है. हालांकि तब कहा जाता है कि बल्लेबाज ने उस फील्डर को बैट से मारा था जो उनका कैच करने जा रहा था. यह खबर तो अच्छा नहीं थी लेकिन इसने क्रिकेट बैट को चर्चा में तो ला दिया.
वक्त के साथ-साथ क्रिकेट बैट में बदलाव होते गए. बल्ले ने अगले करीब 100 साल तक के लगातार चलते सफर में अपना रूप फिर बदला. बल्ले का निचला हिस्सा सपाट हो गया. इतना ही नहीं अब पूरा बैट एक ही लकड़ी से बनता था. इससे बैट की लंबाई पर भी असर पड़ा. अब बल्ले पहले से कम लंबे होने लगे. लेकिन उस वक्त तक बैट का वजन 3 किलोग्राम तक होता था.
सन 1880 में मेरिलबोन क्रिकेट क्लब, जो क्रिकेट के नियमों की संरक्षक है, ने बल्ले को लेकर कुछ तय नियम बना दिए. बल्ले की चौड़ाई, लंबाई को लेकर बात की गई. दरअसल, 1771 में इंग्लैंड में रीगेट का प्रतिनिधित्व करने वाला एक बल्लेबाज ऐसा बैट लेकर मैदान पर उतरा जिससे विकेट ही नजर नहीं आ रहे थे.
बल्ले के इस सफर में ओवरआर्म बॉलिंग ने बहुत बड़ा असर डाला. 1900 आते-आते ओवरआर्म बॉलिंग ही क्रिकेट का तय मानक बन गया. इससे गेंदबाजों की रफ्तार बढ़ गई. और इन तेज गेंदों को खेलने के लिए बैट पहले से ज्यादा मजबूत बनाए जाने लगे. बैट की चौड़ाई बढ़ी ताकि गेंद को अच्छी तरह से हिट किया जा सके. बैट तब भी एक ही लकड़ी से बनते थे.
लेकिन अब बैट दो अलग हिस्सों में बनते हैं. बैट का हैंडल बांस की लकड़ी से बनता है. जिससे वह लचीला व हल्का होता है. वहीं क्रिकेट का बैट वैसे एक खास किस्म की लकड़ी ‘विलो’ से बनता है. विलो की लकड़ी मजबूत और हल्की होती है जिससे बल्लेबाजों को आसानी होती है. बल्ले का अगला हिस्सा सपाट होता है. और पिछला उभरा हुआ और नीचे से वी आकार का. इससे बैट के वजन का संतुलन भी बना सकता है.
एक वक्त ऐसा भी ऐसा आया जब दोनों ओर से खेले जा सकने वाला बल्ला सामने आया. इसके बाद 1974 में जीएन100 स्कूप नाम का बैट आया. जो आगे चलकर मौजूदा बैट का आधार बना. यह क्रांतिकारी बैट था. यह हल्का, मजबूत और इस्तेमाल करने वाला बल्ला था.
क्रिकेट के बैट की लंबाई 38 इंच से ज्यादा नहीं हो सकती. और इसी चौड़ाई 4.25 इंच से ज्यादा नहीं हो सकती. बल्ले की गहराई 6.7 सेंटीमीटर से ज्यादा और उसके एज यानी किनारे 4.0 सेंटीमीटर से ज्यादा नहीं हो सकती हैं. हालांकि जिस बैट से युवराज सिंह खेल रहे हैं उसके किनारे काफी कम चौड़े हैं. और इसलिए कई लोगों का मानना है कि उस वक्त गेंद और बल्ले में काफी कड़ी टक्कर होती थी. इतना ही नहीं हैंडल बल्ले के कुल आकार का 52 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता. साथ ही क्रिकेट बैट ऐसा नहीं हो सकता जिससे गेंद को किसी तरह का कोई नुकसान पहुंचे.
आईपीएल में आपने देखा होगा कि कितनी ही बार अंपायर एक यंत्र से बल्ले का किनारा मापते थे. और अगर बैट उससे नहीं गुजरता था तो बल्लेबाज को उससे खेलने की इजाजत नहीं मिलती. क्रिकेट का बैट आज पहले से बेहतर हैं, हल्के हैं और उनसे गेंद अधिक दूर तक जा रही है. और ऐसे में गेंदबाजों के लिए भी मुश्किलें बढ़ रही हैं. और चुनौतियां भी.
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