जोश हेजलवुड © Getty Images
जोश हेजलवुड © Getty Images

भारत के खिलाफ आगामी वनडे श्रृंखला के पहले तीन मैचों के लिए जब ऑस्ट्रेलियाई चयनकर्ताओं ने 13 सदस्यीय टीम की घोषणा की थी तब उनके इस निर्णय ने भारतीय टीम को भौंचक्का छोड़ दिया था। लेकिन किस वजह से भारतीय टीम ठगी सी रह गई थी उसका कारण अब साफ समझ में आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया की इस टीम में भले ही अनुभवी गेंदबाज ना हों लेकिन पूरी टीम तेज गेंदबाजों और मध्यम तेज गति के गेदबाज ऑलराउंडर खिलाड़ियों से भरी पड़ी है। इस टीम में हाल ही में वेस्टइंडीज के खिलाफ संपन्न हुई श्रृंखला में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले स्पिनर नाथन ल्योन को मौका नहीं दिया गया वहीं शेन वॉटसन से भी किनारा कर लिया गया। ऑस्ट्रेलिया टीम का चयन करने वाले चयन समिति ने यह साफ कर दिया है कि पहले तीन मैच पर्थ, ब्रिस्ब्रेन और मेलबर्न के मैदानों पर खेले जाने हैं जो तेज गेंदबाजों को मदद प्रदान करते हैं। ऐसे में एक विशेष स्पिनर को इन तीन मैचों में जगह देने का कोई तुक ही नहीं बनता। ये भी पढ़ें: टीम इंडिया को जीत दिलाएगी ये तीन बातें

बहरहाल, पार्ट टाइम स्पिनर की जिम्मेदारी ग्लेन मैक्सवेल व खुद कप्तान स्टीवन स्मिथ पूरी करते नजर आएंगे। वहीं उनके तेज गेंदबाजी आक्रमण की अगुआई युवा गेंदबाज जोश हेजलवुड करेंगे। हेजलवुड का साथ देने के लिए दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज केन रिचर्डसन भी तैयार हैं। रिचर्डसन ऑस्ट्रेलिया के लिए अब तक 8 वनडे और दो टी20 मैच खेल चुके है। रिचर्डसन ने अपना अंतिम वनडे मैच दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ साल 2014 में खेला था। दो तेज गेंदबाजों की जगह दो नए नवेले तेज गेंदबाज जोएल पेरिस और विक्टोरिया के तेज गेंदबाज स्कॉट बोलैंड नजर आएंगे। इन दोनों गेंदबाजों की मजबूती में मिचेल मार्श और जेम्स फॉकनर भी अपना योगदान देंगे। वहीं स्पिन गेंदबाजी का जिम्मा ग्लेन मैक्सवेल लेंगे। तो आइए जानते हैं ऑस्ट्रेलिया की इस कम जानी जाने वाली गेंदबाजी की मजबूती, कमजोर, मौके और खतरे के बारे में। ये भी पढ़ें: कॉमनवेल्थ बैंक सीरीज 2008: जब ऑस्ट्रेलिया पर भारी पड़े धोनी के धुरंधर

मजबूती: भारतीय बल्लेबाज परंपरागत रूप से स्पिन गेंदबाजी को बेहतर खेलते रहे हैं। लेकिन तेज और उछाल भरी गेंदबाजी के आगे उनकी कमजोरी अक्सर निकलकर सामने आती है। ज्यादातर इस तरह की समस्याओं का सामना वह उप-महाद्वीप के बाहर खेलते हुए करते हैं। भारतीय टीम की इस कमजोरी क भांपते हुए ऑस्ट्रेलिया ने चार विशेषज्ञ तेज गेंदबाजों को रखकर एक अच्छा निर्णय लिया है। उनकी इस गेंदबाजी का उन्हें पर्थ और ब्रिस्ब्रेन की पिचों पर खूब लाभ मिलेगा। ऐसे में भारतीय बल्लेबाजों की कमजोरी पकड़ने में भी उन्हें मदद मिलेगी। दो नए गेंदबाजों पेरिस- जो गेंद को दोनों ओर स्विंग कराना जानते हैं और बोलैंड- जो अंतिम ओवरों में अपनी गजब की गेंदबाजी के लिए जाने जाते हैं। ये दोनों गेंदबाज शुरुआती ओवरों में भारतीय खिलाड़ियों को अटकलें लगाने पर मजबूर करेंगे। पेरिस ने भले ही अभी तक मात्र 2 प्रथम श्रेणी मैच खेले हैं लेकिन उनके द्वारा 16.85 के औसत से लिए गए 14 विकेट्स उनकी प्रतिभा को साफतौर पर दर्शाते हैं। वहीं लिस्ट ए गेम में भी उनका प्रदर्शन बेहतरीन रहा है। उन्होंने 13 लिस्ट ए मैचों में 17.79 के औसत से 24 विकेट लिए हैं। इस सीजन में बोलैंड ने भी बेहतरीन खेल दिखाया है। उन्हें वेस्टइंडीज के खिलाफ दूसरे व तीसरे टेस्ट के लिए चुना गया था लेकिन अंतिम 11 में चुनाव नहीं हो पाया। इंग्लैंड के बेहतरीन बल्लेबाज और बिग बैश लीग में बोलैंड के टीम मेट पीटरसन भी उन्हें बेहतरीन गेंदबाज बताते हैं।

कमजोरी: इस टीम की एकमात्र संभव कमजोरी है एक मुख्य स्पिनर की कमी जिसकी वजह से यह तेज गेंदबाजों पर ज्यादा निर्भर नजर आती है। ल्योन को टीम में जगह देकर ऑस्ट्रेलिया टीम अपने स्कॉयड को ज्यादा बढ़िया बना सकती थी। जैसा कि ल्योन टीम में नहीं है तो ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के पास सिर्फ एक विकल्प ग्लेन मैक्सवेल बचते हैं। भारत की बढ़िया बैटिंग लाइन अप को देखते हुए उनकी स्पिन गेंदबाजी उनपर असर डालेगी इस पर संशय है। हालांकि कप्तान स्टीवन स्मिथ भी पार्ट लेग ब्रेक गेंदबाजी कर सकते हैं, लेकिन एक बार फिर से एक विशेषज्ञ स्पिनर की कमी ऑस्ट्रेलिया टीम को इन मैचों में खलेगी।

मौके: जैसा कि स्टार्क, नाथन कूल्टर नाइल, पैट कमिंस, पीटर सिडल चोट के कारण इस श्रृंखला से बाहर हो गए हैं। ऐसे में नए गेंदबाजों रिचर्डसन, बोलैंड और पेरिस के पास अच्छा प्रदर्शन करके राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का अच्छा मौका होगा। यह हेजलवुड के लिए भी अच्छा मौका होगा ताकि वह साबित कर सकें कि वह अन्य तेज गेंदबाजों के जैसे ही ऑस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाजी आक्रमण की अगुआई करने के लायक हैं। वहीं युवा ऑलराउंडर मिचेल मार्श हर नए मैच के साथ बढ़िया प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी शेन वॉटसन के मुकाबले अपनी उपयोगिता साबित करना बाकी है। ऐसे में भारत के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन करके वह वॉटसन को टी20 विश्न कप 2016 के लिए कड़ी टक्कर देना चाहेंगे।

खतरे: ऑस्ट्रेलिया का ज्यादातर गेंदबाजी आक्रमण नया, कच्चा और उसी समय पर गैर-अनुभवी है। मुख्य तेज गेंदबाज हेजलवुड, रिचर्डसन और अभी पर्दापण करने की कगार पर खड़े पेरिस और बोलैंड ने कुल 21 अंतरराष्ट्रीय वनडे मैच खेले हैं। वहीं इस फेहरिस्त में अगर फॉकनर और मार्श को जोड़ लिया जाए तो सूची 88 वनडे पहुंच जाती है। अगर इस गेंदबाजी आक्रमण की तुलना भारतीय गेंदबाजी आक्रमण से की जाए तो बेहद साधारण नजर आता है। भारत के टॉप पांच गेंदबाजों(ईशांत शर्मा, उमेश यादव, रविंद्र जडेजा, अश्विन और अक्षर पटेल) ने कुल 350 से ऊपर वनडे मैच खेले हुए हैं। ऐसे में भारतीय बल्लेबाज शुरू से ही ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों पर आक्रमण करना चाहेंगे और अगर उनका आक्रमण सीधा चोट करता है तो संभव है कि ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज दबाव में आ जाएं और भारतीय टीम बड़ा स्कोर बना सके।

पूरे ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजी आक्रमण को देखा जाए तो वे पूरी तरह आशान्वित नजर आते हैं। हो सकता है कि युवा गेंदबाजों को शुरुआत में समस्याएं उठानी पड़े, लेकिन अगर उनकी आंखें जम गई और वे वही क्रिकेट खेलने में सफल साबित हुए जो वह घरेलू स्तर पर खेलते आए हैं तो उनमें वह क्षमता है कि वे भारतीय बल्लेबाजी क्रम को बुरी तरह झकझोर सकते हैं। खैर, ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज क्या कर पाते हैं इसका खुलासा 12 जनवरी को पर्थ में खेले जाने वाले पहले वनडे मैच में होगा।