शेन वॉर्न की गेंद पर छक्का जड़ते हुए सचिन तेंदुलकर © Getty Images
शेन वॉर्न की गेंद पर छक्का जड़ते हुए सचिन तेंदुलकर © Getty Images

भले ही सचिन तेंदुलकर एक पारी में सर्वाधिक छक्के जड़ने वालों की लाइन में कहीं खड़े नजर न आते हों। लेकिन सचिन तेंदुलकर ने अपने क्रिकेट जीवन में कुछ ऐसी पारियां खेलीं जिसने उन्हें पूरे क्रिकेट जगत का डार्लिंग बना दिया। गौर करें कि हम शारजहां के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। बल्कि साल 1998 में पेप्सी त्रिकोणीय श्रृंखला की बात कर रहे हैं। इस सीरीज के चौथे मैच में सचिन तेंदुलकर ने अपनी 100 रनों की पारी में ही 7 छक्के जड़ दिए थे। लेकिन उन्होंने अपने इस कारनामें को अंजाम तक कैसे पहुंचाया था। आइए आपको रूबरू कराते हैं।

यह बात साल 1998 की है। भारत में तीन देशों की वनडे सीरीज का आयोजन किया गया। ये तीनों टीमें भारत, ऑस्ट्रेलिया और जिम्बाब्वे थीं। सीरीज के पहले दोनों मैच भारत ने ऑस्ट्रेलिया और जिम्बाब्वे के खिलाफ जीते। चौथा मैच अब कानपुर में खेला गया भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच। मैच में ऑस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीव वॉ ने टॉस और पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया। पहले बल्लेबाजी करने उतरी ऑस्ट्रेलिया की शुरुआत खराब रही और उन्होंने 35 रनों पर ही अपने 2 विकेट गंवा दिए। इसके बाद तो अजीत अगरकर जैसे ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों के पीछे ही पड़ गए और हर निश्चित अंतराल में विकेट गिराने लगे। आलय ये था कि ऑस्ट्रेलिया ने 108 रनों पर अपने 5 विकेट गिरा दिए। ऐसे में लग रहा था कि ऑस्ट्रेलियाई पारी 150 के भीतर की सिमट जाएगी। [ये भी पढ़ें: 183 रन बनाओ, भारत की कप्तानी पाओ]

लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क्योंकि रिकी पोंटिंग एक छोर से डटे हुए थे और उन्हें अब टॉम मूडी के रूप में एक साथी भी मिल गया। दोनों ने आपस में अर्धशतकीय साझेदारी छठवें विकेट के लिए निभाई और स्कोर को 185 तक पहुंचाया। इस बीच पोंटिंग को अगरकर ने 84 रनों के व्यक्तिगत स्कोर पर आउट कर दिया। इस तरह फिर से ऑस्ट्रेलिया टीम मझधार में खड़ी नजर आई। लेकिन मूडी ने 49वें ओवर तक अपने आपको बचाए रखा और स्कोरकार्ड को बढ़ने दिया। अंततः 49वें ओवर में मूडी को अगरकर ने बोल्ड कर दिया। मूडी ने 44 रन बनाए। ऑस्ट्रेलिया ने 50 ओवरों में 9 विकेट पर 222 रन बनाए। भारत की ओर से अजीत अगरकर ने सर्वाधिक 4 विकेट लिए।

जवाब में टीम इंडिया बल्लेबाजी के लिए उतरी। सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली ने चिरपरिचित अंदाज में बल्लेबाजी करना शुरू की। गांगुली एक छोर से सचिन को स्ट्राइक देने लगे। दो- चार ओवरों के बाद सचिन तेंदुलकर ने उठा- उठाकर स्ट्रोक जड़ने शुरू कर दिए। डेमियन फ्लैमिंग समेत माइकल कॉस्प्रोविच और गेविन रॉबर्टन की उन्होंने खूब बखिया उधेड़ी। सचिन इस दौरान छक्के पर छक्के जड़ रहे थे। अंततः सचिन ने अपना शतक 88 गेंदों में 5 चौकों और 7 छक्कों के सहारे पूरा किया। इतनी छोटी पारी में इतने छक्के जड़ना उस जमाने में बड़ी बात हुआ करती थी। सचिन ने इस दौरान अपने चिर- प्रतिद्वंदी शेन वॉर्न की गेंदों पर भी छक्के जड़े। आलय यह था कि दोनों ने पहले विकेट के लिए 28 ओवरों में ही 175 रन जोड़ दिए। शतक जड़ने के बाद फिर से शेन वॉर्न की गेंद को हवा में खेलने के प्रयास में सचिन तेंदुलकर को वॉर्न ने कैच आउट करवा दिया।

इस तरह 175 के स्कोर पर 29वें ओवर में भारत ने पहला विकेट गंवाया। सचिन ने 100 रनों की पारी के लिए 89 गेंदें खेलीं। इस दौरान उन्होंने 5 चौके और 7 छक्के जड़े। सचिन के आउट होने के थोड़ी देर मोहम्मद अजहरुद्दीन को वॉर्न ने ही आउट कर दिया और इस तरह टीम इंडिया के 183 रनों पर दो विकेट गिर गए। इसके पहले कि टीम इंडिया संभल पाती, 197 के कुल योग पर गांगुली को कॉस्प्रोविच ने आउट कर दिया। गांगुली ने 72 रन बनाए जिसमें 9 चौके और 1 छक्का शामिल था। इस तरह टीम इंडिया भारी दबाव में आ गई।

टीम इंडिया को जीतने के लिए 26 रनों की दरकार थी औ उनके 7 विकेट शेष थे। इसके बाद बल्लेबाजी करने विनोद कांबली आए। कांबली आते ही आउट हो गए और 212 रनों पर 4 विकेट खोने के साथ ही मैच अब पलटी खा चुका था। ऐसा लग रहा था कि अब मैच पलट जाएगा। लेकिन अजय जडेजा ने कनितकर के साथ मिलकर पारी को जैसे तैसे संभाला और 45वें ओवर में भारत को 6 विकेट से जीत दिलाई। जडेजा ने अपने 6 रनों के लिए 31 गेंदें खेलीं और नाबाद लौटे। ये वही दौर था जब सचिन के आउट होने के बाद विकटों की पतझड़ लग जाता था। इस मैच में भी वैसा ही हुआ लेकिन टीम इंडिया 6 विकेट से मैच जीत गई।