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रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर का अर्श से फर्श तक का सफर, जानें बड़ी बातें
रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर की आईपीएल इतिहास में दूसरी बार ये गत हुई है।
Published On May 12, 2017, 03:05 PM IST
Last UpdatedMay 12, 2017, 03:05 PM IST

क्रिकेट अनिश्चिताओं का खेल है। इस शब्द को क्रिकेटप्रेमी उस जमाने से सुनते चले आ रहे हैं जब उनके पास रेडियो क्रिकेट की जानकारी का मुख्य माध्यम हुआ करता था। भले ही आज क्रिकेट के स्वरूप में पहले के मुकाबले विस्तृत परविर्तन हो गया हो लेकिन ये बात आज भी क्रिकेट से जुड़ी हुई है और इसे रोचक बनाने में अभिन्न भूमिका निभाती है। आईपीएल 2016 में जीत का परचम लहराने वाली रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने अमूमन सभी का दिल जीता था। भले ही वे फाइनल में हार गए लेकिन अपने चाहने वालों को ये उम्मीद दिला दी थी कि इस सीजन में न सही लेकिन अगले सीजन में वे खिताब जरूर अपने नाम करेंगे लेकिन इस सीजन में तो आरसीबी का डब्बा गुल हो गया और एकदम से सितारों से सजी टीम अर्श से फर्श पर आ गई।
विराट कोहली की अगुआई वाली रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर टीम के अबतक के प्रदर्शन पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि उन्होंने 13 मैचों में दो जीत के साथ कुल 5 अंक अर्जित किए हैं। इस तरह वे प्वाइंट टेबल में आखिरी नंबर पर हैं लेकिन इस बीच गौर करने वाली बात ये है कि इतनी बेहतरीन टीम आरसीबी का बुरा हाल कैसे हुआ? तो आइए गौर करते हैं इसके कारणों पर।
1. ओपनिंग बैटिंग में लगातार बदलाव एक बड़ी समस्या: मौजूदा सीजन में आरसीबी की ओपनिंग बल्लेबाजी उनकी सबसे बड़ी समस्या रही। ओपनिंग जोड़ी ने उन्हें लगभग हर मैच में खराब शुरुआत दी और यही कारण रहा कि उन्होंने लगातार ओपनिंग संयोजन बदले और कुल 5 जोड़ियों को इस पोजीशन पर आजमाया। जाहिर है कि वह अगर ओपनिंग संयोजन को न बदलते हुए गेल- कोहली को लगातार ओपनिंग में उतारते तो तस्वीर दूसरी देखने को मिल सकती थी। गेल को जिस तरह से मैच-दर-मैच ड्रॉप किया गया उससे उनके विश्वास को ठेस पहुंचा और वह आतिशी बल्लेबाजी नहीं दिखा पाए।
2. खिलाड़ियों के चोटिल होने से खड़ी हुई समस्याएं: विराट कोहली ने इस टूर्नामेंट में चोट से उबरने के तुरंत बाद वापसी की थी। वैसे उन्होंने शुरुआत तो बेहतरीन की लेकिन अतिरिक्त जिम्मेदारी का बोझ वह नहीं उठा पाए और हर कुछ करने के प्रयास में उन्होंने हड़बड़ाहट में अपना विकेट गंवाया। डीविलियर्स की बात करें तो वह इस टूर्नामेंट के पहले पीठ की चोट से परेशान थे। टूर्नामेंट के ठीक पहले वह ठीक भी हो गए और आते ही उन्होंने 89 रनों की तेजतर्रार पारी खेली थी लेकिन तीन मैच खेलने के बाद ही डीविलियर्स को फिर से परेशानी हुई और उन्होंने कुछ मैचों का ब्रेक लिया। इस ब्रेक से लौटने के बाद डीविलियर्स बिल्कुल भी फॉर्म में नजर नहीं आए।
जाहिर है डीविलियर्स पर अतिरिक्त दबाव था और चोट के बाद तुरंत लौट रहा खिलाड़ी अतिरिक्त दबाव नहीं झेल पाता। केएल राहुल के चोटिल होने की वजह से टीम को मनदीप सिंह और सचिन बेबी जैसे औसत दर्जे के बल्लेबाजों को शामिल करना पड़ा जिन्होंने बैटिंग से कुछ खास योगदान देने की बजाय छोटे स्कोर पर आउट होकर कोहली, गेल और डीविलियर्स पर दबाव बढ़ाया और वही दबाव टीम को भारी पड़ गया। आंकडों पर गौर करें विराट कोहली ने 9 मैचों में 27.77 की औसत से तीन अर्धशतक लगाते हुए 250 रन बनाए हैं। वहीं, गेल ने 8 मैचों में 19 के औसत से 152 रन बनाए हैं जिसमें सिर्फ एक अर्धशतक शामिल है। डीविलियर्स ने 9 मैचों में 27 की औसत से 216 रन बनाए हैं और उन्होंने भी एक ही अर्धशतक लगाया है। दो मैचों में टीम का 100 के नीचे ऑलआउट होना भी तीनों मुख्य खिलाड़ियों पर अत्याधिक दबाव और घरेलू खिलाड़ियों का लचर प्रदर्शन रहा।
3. गेंदबाजी विभाग ने दिखाया नीचा: इस टूर्नामेंट की शुरुआत में आरसीबी को उस वक्त बड़ा झटका लगा था जब ऑस्ट्रेलिया के मिचेल स्टार्क ने आईपीएल में खेलने से अपना नाम वापस ले लिया था। ऐसे में स्टार्क की भरपाई के लिए आरसीबी ने इंग्लैंड के तेज गेंदबाज टाइमल मिल्स पर अपना दांव खेला और मोटी रकम खर्च करते हुए उन्हें टीम में शामिल किया लेकिन मिल्स के टीम में आने से कुछ खास फायदा देखने को नहीं मिला। उनकी स्लोअर गेंदों को बल्लेबाजों ने अच्छी तरह से पढ़ा और उनकी खूब धुनाई हुई। वह पांच मैचों में सिर्फ पांच विकेट ही ले पाए और इस दौरान उनका इकॉनमी रेट 8.57 का रहा। वहीं अन्य तेज गेंदबाज भी कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाए। वही हाल स्पिन विभाग का रहा चहल ने 10, बद्री ने 8 और नेगी ने 7 विकेट झटके। जाहिर है कि एक बड़ी टीम को अपने खिलाड़ियों से औसत दर्जे के प्रदर्शन की आशा तो नहीं रहती है।
4. डर-डरकर खेले बल्लेबाज: विराट कोहली ने एक इंटरव्यू में इस बात का जिक्र किया था कि उनके बल्लेबाजों में अपने इरादों को क्रियान्वित करने को लेकर कमी दिखी है। वे डर- डरकर खेले हैं। यही कारण है कि वे खुलकर स्ट्रोक नहीं लगा पाए और अपने विकेट गंवाए। जाहिर है कि टी20 फॉर्मेट में बल्लेबाज को स्वछंद होकर खेलने की जरूरत होती है। ऐसे में दबाव में खेलना टीम के लिए ही खराब रहता है।