क्या टी20 के आने से टेस्ट क्रिकेट अपना अस्तित्व खो रहा है?
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इसमें कोई दो राय नहीं है कि टी20 क्रिकेट के आने से लोगों का झुकाव टेस्ट क्रिकेट से हटा है। लेकिन क्या टी20 क्रिकेट ने टेस्ट क्रिकेट के सामने इतना बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है कि वह अगले 20 सालों में बंद होने की कगार पर होगा? ये कहना है कि वेस्टइंडीज के पूर्व क्रिकेटर माइकल होल्डिंग का। होल्डिंग ने हाल ही में एक विदेशी अखबार को दिए एक साक्षात्कार में बताया था कि टी20 क्रिकेट के कारण टेस्ट क्रिकेट का अगले 20 सालों बाद कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। लेकिन होल्डिंग का यह दावा कितना सही है। आइए इसका विश्लेषण करते हैं।

1. बैटों का बड़ा होना:

Is test cricket loosing its identity with the advent of T20 cricket
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टी20 क्रिकेट की इजाद के साथ क्रिकेट में बैट का गेंद पर प्रभुत्व बढ़ा है उनमें से एक है लंबे बैटों का प्रचलन। क्रिकेट के वर्तमान नियमों के मुताबिक एक बैट की चौड़ाई 4.25 इंच से ज्यादा नहीं हो सकती और लंबाई 38 इंच से ज्यादा नहीं हो सकती है। इम्पिरियर कॉलेज लंदन की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सालों में बैट की चौड़ाई व लंबाई बढ़ी है। इसके कारण बल्लेबाजों के लिए बैट को उठाने में और शॉट लगाने में आसानी होने लगी है। रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रकार के बैट से बल्लेबाज को अच्छा प्रदर्शन करने में मदद मिलती है। जाहिर है कि इन सालों में गेंदबाजों की सहूलियत के लिए इस तरह के प्रयोग बहुत की कम किए गए हैं और यही कारण है कि क्रिकेट की इन दोनों विधाओं में एक बड़ी दूरी बन गई है और टेस्ट क्रिकेट को इस कारण से एक गहरा धक्का लगा है। 

2. क्रिकेट की पिचें अब टेस्ट क्रिकेट लायक नहीं: टेस्ट क्रिकेट के पतन के इतिहास को देखें तो इसका सिलसिला 1960 के दशक से ही शुरू हो गया था। जब गेंदबाजों को बल्लेबाजों के आगे कमजोर बनाने के लिए इसी साल क्रिकेट में कवर्ड पिचों का एक चलन शुरू किया गया। इसके पहले रात को क्रिकेट पिचें खुली छोड़ दी जाती थीं जिससे की बाहरी वातावरण के आधार पर क्रिकेट पिच में गेंद को मिलने वाली उछाल तय होती थी। यही नहीं अगर रात को बारिश हो गई तो अगले दिन पिच स्टिकी हो जाती थी जिससे की तेज गेंदबाजों को अच्छी खासी मदद मिलती थी। इंग्लैंड के डेरेक अंडरवुड स्टिकी विकटों के माहिर गेंदबाज थे।

इस परिवर्तन के बाद दुनिया भर में पिचें थोड़ा स्टेंडराइज्ड हो गईं। हालांकि इसके बाद भी विभिन्न देशों की पिचों में अंतर बना रहा। लेकिन पिछले 10 सालों में क्रिकेट की पिचों में और भी परिवर्तन आया है और लगभग दुनिया भर की पिचें एक जैसी हो गई हैं। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में हुए विश्व कप में वहां की पिचों में वह उछाल नहीं देखी गई जिसके लिए वे कालांतर में जानी जाया करती थी। जाहिर है कि क्रिकेट में जिस तरह से गेंदबाजी और बल्लेबाजी में एक असमानता आई है उसने क्रिकेट के सबसे खूबसूरत स्वरूप क्रिकेट को नीरस बना दिया है। पिचों में इस तरह के बदलाव टी20 क्रिकेट के आने के बाद तेजी से हुए हैं और पिचों को हर देश में बल्लेबाजों की सहूलियत के हिसाब से बनाया जाने लगा है। इससे सबसे ज्यादा क्षति टेस्ट क्रिकेट को हुई है।

3. खेलप्रेमियों के नजरिए का बदलना: पिछले कुछ सालों में इंग्लिश प्रीमियर लीग, आईपीएल और फॉर्मूला वन के टेलीवीजन के माध्यम से लोगों के पास पहुंचने के बाद से क्रिकेट देखने वाले एक बड़े वर्ग के खेल को देखने के नजरिए में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है। कहने का मतलब है कि अब खेलप्रेमी कम समय में ज्यादा इंटरटेन होना चाहते हैं। जाहिर है कि टेस्ट क्रिकेट जिसमें परिणाम को देखने के लिए दर्शकों को पांच दिन तक इंतजार करना पड़ता है वह वर्तमान खेलप्रेमियों के वॉचिंग पैटर्न पर फिट नहीं बैठता।

क्रिकेट मैच चाहे वह टी20 हो, वनडे हो या टेस्ट मैच जब तक गेंद और बैट के बीच एक अच्छी जंग देखने को नहीं मिलती क्रिकेट का मजा फीका रहता है। जाहिर है कि आज टेस्ट क्रिकेट कुछ इन्ही कारणों के चलते गर्त में समाता जा रहा है। हालांकि उसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं और टेस्ट क्रिकेट को डे नाइट बनाया जा रहा है जिसमें पिंक गेंद के इस्तेमाल को तरजीह दी जा रही है। इसे शुरू करने के कई कारण है जिनमें एक है कि रात को लोगों के पास वक्त रहता है जिससे की लोग आराम से घरों में टेस्ट मैच देख सकेंगे और दूसरा है रात की ओस का गेंदबाजों को मदद मिलना। हालांकि अभी डे- नाइट टेस्ट का ये शुरुआती दौर है। ऐसे में इसके बारे में इतनी जल्दी कुछ भी कहना मुनासिब नहीं होगा। लेकिन क्या इन परिवर्तनों से टेस्ट क्रिकेट जिसमें बल्लेबाज की तकनीकि और धीरज की असली परीक्षा होती है उसे बचाया जा सकेगा? ये सवाल कल भी था और आज भी है।