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जानिए भारतीय टेस्ट क्रिकेट के पहले कप्तान सी. के. नायडू के बारे में

इनकी शारीरिक मजबूती को देखते हुए होल्कर महाराज ने उन्हें अपनी सेना में कैप्टन बनाया और यहीं से वह कर्नल सी. के. नायडू नाम से जानें जाते है।

user-circle cricketcountry.com Written by Vivek Kumar
Last Updated on - January 4, 2016 6:10 PM IST

सी. के. नायडू © Getty Images
सी. के. नायडू © Getty Images

भारतीय क्रिकेट टीम के प्रथम टेस्ट कप्तान कोट्टारी कंकैया नायडु  उस उम्र तक क्रिकेट खेलते रहे, जिसके बारे में सोचना भी आज के खिलाड़ियों के लिए एक सपने के जैसा है। उनके अन्दर कमाल के फिटनेस थी जो आजकल के युवा क्रिकेटरों में बहुत कम देखने को मिलती है। आज के युवा क्रिकेटर अपने फिटनेस से हमेशा जूझते रहते है लेकिन नायडू की उस समय की फिटनेस आज के उन खिलाड़ियों के लिए एक सबक है, जो दूसरे तीसरे मैच के बाद ही चोटिल हो जाते हैं। आज के समय में जब ख़िलाड़ी 37 साल की उम्र में रिटायर होने लगते है, तब इन्होंने ने टेस्ट मैंच खेलना शुरू किया था और 68 साल तक फिट रहकर क्रिकेट खेलते रहे। ये भी पढ़ें: साल 2015 की तीन सबसे तेज पारियां

भारत की प्रथम टैस्ट टीम के कप्तान सी. के. नायडू का जन्म 13 अक्टूबर, 1895 को नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ था। कर्नल कोट्टारी कंकैया नायडू को प्यार से सभी लोग सी. के. कहकर पुकारा करते थे। भारत के प्रथम टेस्ट मैच में वह भारतीय टीम के कप्तान थे यह मैच 1932 में इंग्लैंड के विरुद्ध खेला गया था। इंग्लैंड की टीम पूरी तरह मजबूत थी, लेकिन सी. के. नायडू की कप्तानी में भारतीय टीम ने जमकर उनका मुक़ाबला किया।

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इनकी  लम्बाई छह फुट था। ये दाहिने हाथ के क्रिकेट खिलाड़ी व दाएँ हाथ के गेंदबाज भी थे। उनकी शारीरिक बनावट किसी एथलीट की भाँति हृष्ट-पुष्ट थी। अतः अपने जोरदार स्ट्रोक और तेज हिट के कारण विरोधियों के खेल के दबाव को कम कर देते थे। उनकी शारीरिक मजबूती को देखते हुए होल्कर महाराज ने उन्हें अपनी सेना में कैप्टन बनाया और यहीं से वह कर्नल सी. के. नायडू नाम से जानें जाते है। ये भी पढ़ें: साल 2015 में खूब चमके पाकिस्तान टीम के ये दो महारथी

वर्ष 1926-1927 में उन्होंने सबसे ज्यादा लोकप्रियता प्राप्त की, जब उन्होंने बम्बई में 100 मिनट में 187 गेंदों पर 153 रन बना दिए। यह मैच ‘हिन्दू’ टीम तरफ से ए. ई. आर. गिलीगन की एम. सी.सी. के विरुद्ध चल रहा था। जिसमें इनके 11 छक्के तथा 13 चौके शामिल थे। बम्बई के जिमखाना मैदान पर ‘हिन्दू’ टीम के लिए उनकी आखिरी पारी पर उन्हें चांदी का बल्ला भी भेंट किया गया था।
क्रिकेट जब राजा महाराजाओं का खेल हुआ करता था, तब उन्हें इग्लैंड जा रही भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया। वर्ष 1932 में भारतीय टीम के कप्तान पोरबंदर महाराज थे, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वह नहीं जा पाए और फिर कर्नल सी. के. नायडू को भारतीय टीम का पहला कप्तान बनने का गौरव प्राप्त हुआ। ये भी पढ़ें: क्या से क्या बन गए ये क्रिकेटर

कर्नल सी. के. नायडू ने ‘आंध्र प्रदेश केन्द्रीय भारत’, ‘केन्द्रीय प्रोविंसज एंड बरार’, ‘हिन्दू’, ‘होल्कर यूनाइटेड प्राविंस’ तथा भारतीय टीमों के लिए क्रिकेट खेला। 1932 में इंग्लैंड दौरे के दौरान सी. के. नायडू ने प्रथम श्रेणी के सभी 26 मैचों में हिस्सा लिया था, जिनमें 40.45 की औसत से 1618 रन बनाए और 65 विकेट लिए। इन्हें 1933 में विज़डन द्वारा ‘क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर’ चुना गया था। 1932 में सी. के. नायडू ने कमाल का खेल दिखाते हुए 32 छक्के लगाए थे। सी. के. नायडू का अंतरराष्ट्रीय कैरियर बहुत छोटा रहा। उन्होंने मात्र 7 टैस्ट मैच खेले, लेकिन भारतीय क्रिकेट जगत में उन्होंने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया। उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 1956 में ‘पद्मभूषण’ प्रदान किया गया, जो भारत का तीसरा बड़ा राष्ट्रीय पुरस्कार है। ये भी पढ़ें: जानिए इन क्रिकेटरों ने क्यों गुदवाए टैटू
सीके नायडू अपनी तूफानी बल्लेबाजी के लिए मशहूर थे। एक बार उन्होंने इंग्लैण्ड के एजबेस्टन में मैच खेलते हुए ऎसा छक्का मारा कि गेंद मैदान के बाहर रिया नदी के पार जाकर गिरी थी। रिया नदी वारविकशायर और वार्सेस्टरशायर काउंटी के बीच सीमा बनाती है। वे दुनिया के पहले बल्लेबाज थे जिन्होंने मैच के दौरान गेंद एक काउंटी से दूसरे काउंटी में मार दी थी। भारतीय क्रिकेट को नई ऊँचाईयाँ दिलाने वाले सी. के. नायडू का देहांत 14 नवम्बर, 1967 को इन्दौर में हुआ।