हरभजन सिंह और एंड्रू सायमंड्स © Getty Images
हरभजन सिंह और एंड्रू सायमंड्स © Getty Images

6 जनवरी साल 2008 को क्रिकेट जगत में एक ऐसा वाक्या हुआ जिसने समूचे विश्व का ध्यान अपनी तरफ खींचा। भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर थी और दूसरे टेस्ट मैच के दौरान सिडनी में दो खिलाड़ियों के बीच ऐसा वाक्या हुआ जिसके बाद नौबत सीरीज के रद्द होने तक की आ गई। उस विवाद ने बड़े से बड़े खिलाड़ी को घसीटा और सचिन तेंदुलकर-रिकी पोंटिंग जैसे खिलाड़ी भी इससे अछूते नहीं रह सके। आखिर ऐसा कौन सा विवाद था जिसने क्रिकेट जगत को हिला कर रख दिया था और क्या हुआ था उस दिन आइए जानते हैं।

साल 2008 में भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर थी। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चार मैचों की टेस्ट सीरीज खेली जानी थी। पहला मैच ऑस्ट्रेलिया ने जीत लिया था और सीरीज का दूसरा टेस्ट सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में खेला जाना था। दूसरे टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के कप्तान रिकी पोंटिंग ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। भारत ने बेहतरीन शुरुआत करते हुए ऑस्ट्रेलिया के दोनों सलामी बल्लेबाजों को 24 रनों के भीतर ही पवेलियन भेज दिया। ऑस्ट्रेलिया के दो विकेट झटककर भारतीय गेंदबाज अब ऑस्ट्रेलिया पर हावी होने की कोशिश में लगे थे। लेकिन तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने आए रिकी पोंटिंग ने चौथे नंबर के बल्लेबाज माइक हसी के साथ मिलकर ऑस्ट्रेलियाई टीम को संकट से निकाला और टीम का स्कोर 100 के पार पहुंचा दिया।

शुरुआती झटकों से उबर चुकी ऑस्ट्रेलिया के कप्तान पोंटिंग ने अपना अर्धशतक पूरा कर लिया और हसी भी अपने अर्धशशतक की तरफ बढ़ रहे थे। भारतीय टीम को विकेट की तलाश थी। ऐसे में हरभजन सिंह ने पोंटिंग को 55 के कुल योग पर आउट कर भारत की झोली में तीसरी सफलता डाल दी। भारत को विकेट की बहुत जरूरत थी। अभी ऑस्ट्रेलिया पोंटिंग के विकेट से उबरा भी नहीं था कि आर पी सिंह ने हसी को 41 रन के निजी स्कोर पर आउट कर भारत को चौथी सफलता दिला दी। भारतीय टीम एक बार फिर से मैच में वापसी कर चुकी थी। लेकिन एंड्रू सायमंड्स ने निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ मिलकर पारी को संभाल लिया और अपना शतक ठोक डाला। वहीं सायमंड्स के शतक और निचले क्रम की उपयोगी पारियों की बदौलत ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 463 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया। ये भी पढ़ें: इतिहास महेंद्र सिंह धोनी को सबसे सफल कप्तान के रूप में याद रखेगा

बड़े लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को माकूल जवाब दिया। भारत की पारी में सचिन तेंदुलकर, वीवीएस लक्ष्मण ने जहां शतक लगाए तो द्रविड़, गांगुली और हरभजन ने अर्धशतक ठोंके। लेकिन मैच के तीसरे दिन मैदान पर जो कुछ भी घटा उसका असर पूरी सीरीज में पड़ा। दरअसल, ये पूरा मामला हरभजन के अर्धशतक के बाद शुरू हुआ। सचिन के साथ जब हरभजन सिंह क्रीज पर बल्लेबाजी कर रहे थे तो हरभजन ने कई बार सचिन से कहा कि सायमंड्स मुझे उकसा रहे हैं। जिसपर सचिन ने कहा कि इन सब बातों पर ध्यान मत दो और बल्लेबाजी में अपना ध्यान केंद्रित करो। हालांकि इसके बाद हरभजन कुछ ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के साथ दोस्ताना रवैया अपना रहे थे। हरभजन ने शॉट खेला और एक रन लेने के दौरान उन्होंने ब्रेट ली पीठ हल्के से थपथपाई। जिसके बाद सायमंड्स आग बबूला हो गए। सायमंड्स से ये बर्दाश्त नहीं हुआ कि ब्रेट ली के साथ विपक्षी टीम के खिलाड़ी दोस्ताना रवैया अपनाएं। सायमंड्स ने हरभजन के खिलाफ अभद्रता जताई।

सायमंड्स लगातार हरभजन को उकसा रहे थे और एक मौके पर दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि मैच में अंपायरिंग कर रहे मार्क बेंसन ने हरभजन से बातचीत की। अंपायर जब हरभजन से बात कर रहे थे तो सारी ऑस्ट्रेलियाई टीम उन्हें घेर कर खड़ी हो गई और हरभजन को अंजाम भुगतने की धमकी धेने लगी। हालांकि ऑस्ट्रेलिया के चक्रव्यूह में हरभजन फंस चुके थे और वह 63 रन बनाकर आउट हो गए। लेकिन मामला यहां समाप्त हुआ तीसरे दिन का खेल खत्म होने के बाद ऑस्ट्रेलिया ने हरभजन के खिलाफ आधिकारिक शिकायत दर्ज करा दी।

क्रिकेट के सबसे बड़े विवाद की शुरुआत हो चुकी थी और ऑस्ट्रेलिया ने आरोप लगाया कि हरभजन ने सायमंड्स को मंकी (बंदर) कहा, जिसे रंगभेदी टिप्पणी की तर्ज पर माना जाता है। हालांकि भारत और ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड के बीच अक्टूबर 2007 में तय किया गया था कि किसी भी तरह के रंगभेदी मामले में कप्तान पहले मैच रेफरी को रिपोर्ट करेंगे। लेकिन अगर पोंटिंग अनिल कुंबले के समक्ष इस मामले को रखते तो शायद मामला इतना आगे नहीं बढ़ता। तीसरे दिन का खेल खत्म होने के बाद माइक प्रॉक्टर ने बताया कि मामले की सुनवाई चौथे दिन होगी और बाद में इसे मैच के अंतिम दिन के लिए टाल दिया गया।

अब भारत के सामने मैच को बचाने के साथ-साथ मंकीगेट का भी दबाव था। भारतीय टीम आखिरी दिन मैच बचाने के लिए मैदान पर उतरी। टीम के सामने कई सारी चुनौतियां थीं। लेकिन ऐसा लग रहा था कि सब कुछ भारत के खिलाफ ही हो रहा है। मैच के आखिरी दिन अंपायरों ने कई गलत फैसले दिए और तीन बड़े खिलाड़ियों को गलत आउट करार दिया। राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और एमएस धोनी अंपायर के गलत फैसले का शिकार बने। द्रविड़ को अंपायर स्टीव बकनर ने कैच आउट दिया जबकि गेंद बल्ले पर लगी ही नहीं थी। विकेटकीपर एडम गिलक्रिस्ट स्टम्प्स के पास खड़े थे और इसके बावजूद उन्होंने आउट की अपील की। वैसे गिलक्रिस्ट बहुत इमानदार क्रिकेटर हैं और उनके द्वारा ऐसा करना दुखदायी रहा। हमें तो लगा था कि राहुल को पगबाधा करार दिया गया है। इसके कुछ देर बाद इसी प्रकार सौरव गांगुली और महेंद्रसिंह धोनी को भी गलत ढंग से आउट दिया गया। तीनों ही खिलाड़ी शानदार बल्लेबाजी कर रहे थे और ऐसे में भारती की मैच बचाने की उम्मीद टूट गई थी। और अंत में भारतीय टीम ने टेस्ट गंवा दिया। ये भी पढ़ें: कपिल देव के 58वें जन्मदिन पर जानें उनसे जुड़ी 10 खास बातें

लेकिन असली खेल अभी बाकी थी। मैच के बाद भारतीय टीम को मंकी गेट की सुनवाई के लिए स्टेडियम में ही ठहरने को कहा गया। इसके बावजूद भी भारतीय खिलाड़ियों ने ऑस्ट्रेलिया को जीत की बधाई दी। वहीं दूसरी तरफ सुनवाई का तरीका बेहद ही अलग था। ऑस्ट्रेलियाई टीम से जुड़े लोगों और भारतीय टीम से जुड़े लोगों की अलग-अलग सुनवाई हुई। सुनवाई का यह तरीका गलत था क्योंकि इस मामले की सुनवाई के वक्त दूसरे पक्ष के लोग मौजूद नहीं थे। सचिन तेंदुलकर इस मामले के मुख्य गवाह थे लेकिन उनसे कोई पूछताछ नहीं की गई। मामले में भज्जी के अलावा चेतन चौहान, मैनेजर एमवी श्रीधर, मीडिया मैनेजर और कप्तान अनिल कुंबले से पूछताछ की गई। माइक प्रॉक्टर अधिकारियों के बयान से संतुष्ट नहीं दिखाई दिए और उन्होंने आधी रात तक वहां टीम को रोक कर रखा। रात दो बजे टीम को होटल जाने की अनुमति दी गई। घटनाक्रम की वजह से दोनों टीमों के बीच मतभेद काफी बढ़ गए थे और ऐसा लग रहा था कि भारतीय खिलाड़ियो के साथ धोखेबाजी हुई है।

भारतीय टीम सिडनी टेस्ट के बाद तीसरे टेस्ट से पहले प्रथम श्रेणी मैच खेलने की तैयारी कर रही थी तभी खबर आई की हरभजन पर तीन मैचों का प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे में भारतीय टीम ने इस फैसले के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया। क्योंकि टीम के मुताबिक सिडनी में सुनवाई के रूप में टीम के साथ मजाक किया गया था। खिलाड़ियों ने बीसीसीआई के समक्ष पूरे मामले को रखा और आगे की कार्रवाई के लिए बैठक की। भारत के कप्तान अनिल कुंबले और सचिन तेंदुलकर ने मामले की अगुआई की और फैसला लिया गया कि अगर हरभजन पर फैसला बरकरार रहता है तो टीम दौरे का बहिष्कार करेगी। और टीम ने इस निर्णय के खिलाफ अपील करने का फैसला किया। टीम ने अब प्रथम श्रेणी मैच में ना जाने का फैसला लिया।

भारतीय टीम को बीसीसीआई की तरफ से पूरा समर्थन मिल रहा था और मामले की देख-रेख भारत के जाने-माने वकील वीआर मनोहर के जिम्मे था। भारतीय टीम की वीआर मनोहर से रोज बात होने लगी और टीम ने मनोहर को सारे मामले से अवगत करा दिया। टीम बहिष्कार के मामले में गंभीर थी क्योंकि अगर हरभजन पर प्रतिबंध अगर जारी रहता तो माना जाता कि हरभजन ने रंगभेदी टिप्पणी की थी। टीम बहिष्कार के परिणाम भुगतने को तैयार थी, क्योंकि टीम बखूबी जानती थी कि यदि दौरा रद्द हुआ तो आईसीसी भारतीय टीम को प्रतिबंधित कर सकती है। लेकिन टीम निर्णय ले चुकी थी। भारतीय टीम पर तनाव हावी होने लगा था और तनाव को कम करने के लिए टीम बोंडी बीच पर वॉलीबॉल खेलने गई। इसके जरिए टीम की एकजुटता बढ़ी। हालांकि सचिन ने मजाकिया लहजे में हरभजन से कहा कि वे इस समय माइकल जैक्सन के बाद दुनिया के दूसरे सबसे लोकप्रिय व्यक्ति बन गए हैं और सचिन ने तो विवाद के कुछ दिनों तक उन्हें ‘एमजे’ के नाम से भी पुकारा।

भारतीय टीम ने आधिकारिक रूप से शिकायत दर्ज करा दी थी और टीम तीसरे टेस्ट की तरफ बढ़ चुकी थी। तीसरा टेस्ट पर्थ में होना था। पर्थ में भारत पहले कभी भी मैच नहीं जीत पाया था। ऐसे में टीम के लिए चुनौतियां बढ़ती ही जा रहीं थीं। विवाद की स्थिति को टालने के लिए मैच की पूर्व संध्या पर आईसीसी के सीनियर मैच रैफरी रंजन मदुगले पर्थ पहुंचे। तनाव कम करने के लिए रंजन की उस्थिति में दोनों टीमों के कप्तानों की बैठक हुई। पर्थ में इससे पहले भारत ने कभी टेस्ट मैच नहीं जीता था, लेकिन ‘मंकी गेट’ विवाद के चलते टीम में जबर्दस्त एकजुटता थी।

सहवाग ने टीम को ठोस शुरुआत दिलाई। सचिन और राहुल ने 139 रनों की साझेदारी की। इस मैच में खेली गई पारी सचिन की सबसे पारियों में से एक थी। भारतीय टीम के प्रयास रंग लाए और टीम ने पर्थ में झंडा गाड़ दिया और ऑस्ट्रेलिया को हराकर करारा जवाब दिया। ड्रेसिंग रूम का माहौल उत्साहपूर्ण हो गया। शैम्पेन की बॉटल्स खोलीं गईं। भारतीय मीडिया को कुछ बोतलें भिजवाई गईं क्योंकि उन्होंने विवाद के क्षणों में टीम का अच्छा साथ निभाया था। टीम को बधाई देने के लिए ब्रेट ली और एडम गिलक्रिस्ट भारतीय ड्रेसिंग रूम में आए। टीम सिडनी की घटना से दुखी थी और ऐसा लग रहा था कि टीम के गुस्से ने पर्थ में जीत दिलवाई है। एडीलेड में 24 से 28 जनवरी तक खेला गया चौथा टेस्ट ड्रॉ रहा और ऑस्ट्रेलिया ने सीरीज जीत ली।

टेस्ट सीरीज खत्म हो चुकी थी लेकिन मामले की सुनवाई अभी बाकी थी। ‘मंकी गेट प्रकरण’ में जस्टिस जॉन हेनसन ने 28 जनवरी को सभी पक्षों की सुनवाई की। मामले में सचिन तेंदुलकर से भी पूछताछ हुई। सचिन ने जो कुछ भी सुना था वह उन्हें बताया और इस बात पर भी आपत्ति जताई कि मैच रैफरी माइक प्रॉक्टर ने टीम को झूठा बताया। प्रॉक्टर ने अपने फैसले में कहा था कि उनका मानना है कि एक पक्ष झूठ बोल रहा है और इसके बाद उन्होंने भज्जी पर तीन टेस्ट मैचों का प्रतिबंध लगाया था। इससे साबित होता है कि उनकी राय में कौन सा पक्ष झूठ बोल रहा था। ये भी पढ़ें: 2014 के बाद कैसा रहा है महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली का प्रदर्शन

लेकिन कहते हैं कि सच संघर्ष कर सकता है लेकिन हार नहीं सकता और उस दिन भी वही हुआ। अंत में न्याय हुआ। अपील पर फैसला यह सुनाया गया कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो सके कि भज्जी ने रंगभेदी टिप्पणी की थी और हरभजन सिंह पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया। भज्जी पर अभद्र भाषा के प्रयोग के लिए आधी मैच फीस का जुर्माना किया गया। दोषमुक्त किए जाने की वजह से भज्जी ने आखिरकार राहत की सांस ली और साथ ही भारतीय टीम ने भी। सीरीज भले ही भारत हार गया था लेकिन इस लड़ाई में भारत को न्याय मिला था जो काफी सुकून देने वाली बात थी।