रमन लांबा ने इंटरनेशनल क्रिकेट में धमाकेदार शुरूआत की थी
रमन लांबा ने इंटरनेशनल क्रिकेट में धमाकेदार शुरूआत की थी

2 जनवरी 1960 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में रमन लांबा का जन्म हुआ था। लांबा अगर ढाका के मैदान पर हेलमेट पहन कर फील्डिंग कर रहे होते तो आज वह 56 साल के होते। मगर क्रिकेट के मैदान पर हमेशा निर्भीक रहने वाले इस स्टार खिलाड़ी ने उस दिन साथी खिलाड़ियों की हेलमेट पहनने की सलाह को अनदेखा किया और सिर पर गेंद लगने की वजह से क्रिकेट के मैदान पर ही अपनी अंतिम सांस ली। यह क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी ट्रेजडी थी। 38 साल की मामूली उम्र में यह खिलाड़ी क्रिकेट के मैदान को हमेशा के लिए छोड़ कर चला गया। लेकिन इससे पहले उसने अपने उस दौर को जिया जिसमें उनकी तुलना मोहम्मद अजहरूद्दीन के साथ की जाती थी।

उस दौर में भारतीय टीम में दो युवा स्टार खिलाड़ी थे। अजहर और लांबा मैदान पर अपने चलने के अंदाज से लेकर, फील्डिंग और विस्फोटक बल्लेबाजी सभी के लिए मशहूर थे। मैदान के बाहर अगर कोई इन दोनों खिलाड़ियों के बारे में ना जानता हो तो वह उनको देखकर कोई फिल्मस्टार समझने की भूल कर बैठे। शायद यही कारण भी था कि दोनों की फैन फॉलोइंग उस दौर में किसी फिल्मस्टार से कम नहीं थी।

भारत के लिए लांबा ने अपना पहला मैच 7 सितंबर 1986 को खेला। ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच में पहले बल्लेबाजी करते हुए 250 रन बनाते हुए भारत के सामने 251 रनों का लक्ष्य रखा। यह लक्ष्य हासिल करना उस दौर में नामुमकिन जैसा था, खासकर ऑस्ट्रेलियाई पेस अटैक के सामने तो इस लक्ष्य का पीछा करना लोहे के चने चबाना जैसा था। मगर पहली बार भारत के खेल रहे लांबा ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों की बखिया उधेड़ दी। लांबा ने उस मैच में ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों को स्टेप आउट करके शॉट लगाए जिसे देखकर बहुत से लोग पहला मैच खेल रहे इस युवा बल्लेबाज की प्रतिभा के मुरीद बन गए। [Also Read: रोमांचक मुकाबले में जब भारत ने पाकिस्तान को हराया और जीत लिया था सिल्वर जुबली इंडिपेंडेंस कप]

मैच भारत ने 36 गेंद पहले ही जीत लिया। लांबा का स्कोर था 53 गेंद पर 64 रन जिसमें 8 चौके और क्रेग मैकडरमॉट की गेंद पर लगाया गया छक्का भी शामिल था। अपनी इस पारी से लांबा ने फैन्स की संख्या दोगुनी कर ली। इसी सीरीज के चौथे मुकाबले में एक बार फिर से उनका बल्ला चमका और इस बार उन्होंने अपने पिछले स्कोर को पीछे छोड़ते हुए 68 गेंदों पर 74 रनों की पारी खेल कर भारत को फिर से जीत दिलाई। सीरीज के अंतिम मुकाबले में लांबा ने अपने इंटरनेशनल करियर का पहला शतक जड़ते हुए मैन ऑफ द सीरीज खिताब पर अपना कब्जा जमाया। अपनी पहली ही सीरीज में लांबा ने मैन ऑफ द टूर्नामेंट बने।

लांबा सिर्फ अपनी बल्लेबाजी से ही नहीं बल्कि फील्डिंग के लिए भी उतने ही मशहूर थे। उस दौर में अजहर भारत के सबसे बेहतरीन फील्डर थे तो लांबा की तेजी का कोई जवाब नहीं था। मगर जैसे-जैसे दोनों का करियर आगे बढ़ा एक सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया तो दूसरे की चमक फीकी होती गई। पहली सीरीज में जादुई आगाज के बाद लांबा धीरे-धीरे गायब होने लगे और उन्हें टीम से अपनी जगह गंवानी पड़ी। [Also Read: नंबर 1 से नंबर 11 तक सभी पोजीशन पर बल्लेबाजी करने वाले खिलाड़ी]

घरेलू सीरीज में वह लगातार रन बनाते रहे लेकिन इंटरनेशनल क्रिकेट में उनका बल्ला धमाल नहीं मचा पा रहा था। 1989 ने उन्होंने एक बार फिर से टीम में वापसी की पूरी तैयारी की और नेहरू कप में 3 अर्धशतक बनाते हुए टीम को संदेश भिजवाया। लेकिन अंगुली की चोट की वजह से इस बार भी वह चूक गए। इसी सीरीज में भारत के लिए सचिन तेंदुलकर ने अपना डेब्यू किया।

लांबा की चोट की वजह से अजहर को आगे बढ़ने का मौका मिला और उन्होंने इस मौके को पूरी तरह भुनाया। उधर सचिन भी बल्ले से धमाल मचाने लगे इस तरह लांबा के लिए वापसी का रास्ता बंद सा हो गया। मगर घरेलू क्रिकेट में वह लगातार रन बनाते हुए वापसी का प्रयास करते रहे। लांबा इतने प्रसिद्ध थे कि जहां भी गए लोगों के दिलों में बस गए।

बांग्लादेश में उन्होंने क्लब क्रिकेट खेलना शुरू किया और कुछ ही समय में लोग उनको ‘डॉन ऑफ ढाका’ कहकर पुकारने लगे। उनकी प्रसिद्धि का अंजादा इस बात से लगाया जा सकता है कि 35 साल की उम्र में भी उनके चाहने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं थी। लोग उनको फिर से भारत के लिए खेलते देखना चाहते थे।