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आज हम आपको रणजी के रणबांकुरों के एक सच्ची वाकये से रूबरू कराने जा रहे हैं। जिसे सुनकर आपको प्रेरणा तो मिलेगी ही साथ ही आपका हौसला भी बढ़ जाएगा। आपको इस वाकये के बाद हार ना मानने की ताकत भी मिलेगी और ये भी पता चलेगा कि अगर आपमें कुछ करने का जुनून और जज्बा है तो आप शून्य से शिखर तक कैसे पहुंच सकते हैं। किराए का छोटा सा घर और आंखों में क्रिकेटर बनने का ख्वाब संजोए दो बच्चे, चार पैसे कमाने के लिए एक हाथ में ट्रक की स्टेयरिंग और अपने सपने को पूरा करने के लिए दूसरे हाथ में क्रिकेट का बल्ला। लेकिन एक फिल्म में क्या खूब कहा गया है, ‘अगर आप किसी को सच्चे दिल से चाहो तो दुनिया की सारी कायनात आपको उससे मिलाने में लग जाती है।’

यह कोई रील लाइफ की कहानी नहीं है बल्कि यह रियल लाइफ की सच्ची कहानी है। यह कहानी है छत्तीसगढ़ रणजी टीम के मीडियम पेसर मोहम्मद शहनवाज हुसैन की। शहनवाज ने अपने संघर्ष को याद करते हुए कहा, ‘एक समय था हम दोनों भाई दुकानों से उधार में क्रिकेट का सामान खरीदते थे। स्कूल पैदल जाते थे।’ ये भी पढ़ें:केएल राहुल को दूसरे टेस्ट के लिए भारतीय टीम में जगह मिली

छत्तीसगढ़ का छोटा सा जिला बिलासपुर, आंखों में भारत के लिए क्रिकेट खेलने का सपना संजोय शहनवाज की उम्र सिर्फ 23 साल है। उन्हें अपना बचपन ठीक से याद है। 11 साल की उम्र में शहनवाज ने क्रिकेट खेलना शुरू किया। बकौल शहनवाज, ‘घर किराए का था। स्कूल पैदल जाते थे। पापा साबिर हुसैन ट्रक चलाते हैं। घर की कमाई बिल्कुल सीमित थी। कई बार पैसों की किल्लत भी होती थी, लेकिन मम्मी-पापा ने कभी इसे जाहिर नहीं होने दिया। क्रिकेट खेलने के लिए हम दोनों भाई रेलवे ग्राउंड जाते थे। वहीं से बैट, पैड्स और हेलमेट मिल जाते थे। कभी पापा घर पर नहीं होते थे तो मां ने पैसों का जुगाड़ कर हमें खेलने भेजा। हम बड़े हुए और पापा ने खेलते देखा तो बिना कुछ कहे ओवरटाइम करने लगे। उन पैसों से हमने खेलने का सामान खरीदा। कुछ मौके ऐसे आए कि बैट-पैड उधार खरीदे और बाद में पापा ने किश्तों में पैसे चुकाए।’

अपनी कहानी बताते हुए शहनवाज कई बार हिचकते हैं, कई बार उनकी आंखों में आंसू छलक जाते हैं। लेकिन कुरेदने पर मन की बात निकलती है। वह बताते हैं, ‘छोटा भाई शहबाज तो विकेटकीपर बल्लेबाज है। कुछ आगे बढ़ने पर दोनों को मैच फीस मिलने लगी। इससे हमारे क्रिकेट खेलने के खर्चे पूरे होने लगे, लेकिन अब भी घर तो पापा ही जीतोड़ मेहनत कर चलाते हैं। चोट के कारण कंधे के ऑपरेशन का खर्च भी पापा ने उठाया। अगर हम टीम इंडिया में खेले तो पापा को ट्रक नहीं चलाने देंगे। उन्हें आराम करने को कहेंगे’। ये भी पढ़ें:अपने 50वें टेस्ट को यादगार बनाने उतरेंगे विराट कोहली

छत्तीसगढ़ रणजी टीम के फील्डिंग कोच स्वर्ण सिंह कलसी के अनुसार, ‘राइट आर्म गेंदबाज शहनवाज की खासियत उसके लंबे स्पेल करने की कैपेसिटी और तेजी। उसकी इन और आउट स्विंगर शानदार है। 2014-15 के सीजन में अंडर-23 में उसने 22 विकेट लिए थे। जम्मू-कश्मीर के खिलाफ उसके खाते में 7 विकेट आए थे। शहनवाज का भाई शहबाज भी फिलहाल स्टेट की अंडर-23 टीम का हिस्सा है। वह एनसीए में ट्रेनिंग भी कर चुका है।’ आपको बता दें कि रणजी ट्रॉफी में छत्तीसगढ़ की टीम बेहतरीन खेल दिखा रही है।