Devbrat Bajpai
देवब्रत वाजपेयी क्रिकेटकंट्री हिंदी के साथ senior correspondent के पद पर कार्यरत हैं
Written by Devbrat Bajpai
Last Updated on - January 13, 2016 10:20 PM IST


भारतीय क्रिकेट की किवदंती कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट से संन्यास लिए हुए ढाई साल से भी ज्यादा समय बीत चुका है वहीं वह राज्यसभा के सांसद उससे भी पहले से हैं। पिछले सालों में सचिन की सदन में उपस्थिति को लेकर बातें सामने आई थी जिसका उन्होंने बचाव अपने क्रिकेट में व्यस्त रहने को लेकर किया था लेकिन अब क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद सचिन के राज्यसभा सांसद की भूमिका पर फिर से सवाल तल्ख हो चले हैं। गौरतलब है कि सचिन को साल 2012 में उनके क्रिकेट में अतुलनीय योगदान को देखते हुए राज्यसभा का सांसद मनोनीत किया गया था। ये भी पढ़ें: जब मोहिंदर अमरनाथ ने कहा, जावेद मेरे देश को कुछ मत कहना
हाल ही में सचिन ने पिछले तीन सालों में पहला सवाल राज्यसभा में दागा जिसके बाद से सचिन के राजनीतिक करियर को लेकर गाहे-बगाहे चर्चाओं का दौर फिर से परवान चढ़ने लगा है। इनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2012 में राज्यसभा सांसद बनने वाले सचिन ने तीन साल राज्यसभा में सवाल पूछने की जहमत क्यों नहीं उठाई, वह 2013 में क्रिकेट से रिटायर होने के तुरंत बाद क्यों नहीं सदन के कार्य में सक्रिय हुए? साथ ही लोगों के जेहन में यह सवाल भी घर करने लगा है कि क्या राज्यसभा में राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किए जाने वाले सदस्य देश के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं समझते। ये भी पढ़ें: भारत के पांच सबसे तेज गेंदबाज
इस सबसे पहले हम राज्यसभा में राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किए जाने वाले सदस्यों की प्रक्रिया पर गौर कर लेते हैं। राज्यसभा भारत का उच्च सदन है जिसमें अधिकतम 12 सदस्य मनोनीत किए जा सकते हैं। इन सदस्यों को भारत के राष्ट्रपति सत्ताधारी सरकार की सिफारिश पर मनोनीत करते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 80(3) भारत के राष्ट्रपति को कुल 12 सदस्यों को मनोनीत करने का हक प्रदान करता है। इन सदस्यों को साहित्य, विज्ञान, कला और सामाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान व व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। ये भी पढ़ें: भारत के सुनील गावस्कर से चिढ़ता था पाकिस्तान का यह तेज गेंदबाज
वर्तमान में राज्यसभा में सचिन तेंदुलकर समेत 10 मनोनीत सदस्य हैं। इन 10 सदस्यों की सदन में उपस्थिति को देखा जाए तो उनमें सबसे कम उपस्थिति सचिन तेंदुलकर (5.5 प्रतिशत) की है। वहीं सदन में अगर सवाल पूछने की बात करें तो सचिन इस विभाग में भी अन्य मनोनीत सदस्यों से कोसों दूर हैं। सचिन ने हाल ही में सदन में सवाल पूछना शुरू किए हैं और उन्होंने अब तक कुल 7 सवाल ही पूछे हैं। वहीं सदन में वाद-विवाद में शामिल होने की बात करें तो सचिन इसमें एक भी बार शामिल नहीं हुए हैं। भारत सरकार की ‘मेंबर ऑफ पार्लियामेंट लोकल एरिया डेवलपमेंट स्कीम’ के अंतर्गत हर सांसद के पास विकल्प रहता है कि वह जिले के कलेक्टर को सुझाव दे कि वह उसके चुनाव क्षेत्र में 5 करोड़ रुपए की लागत का विकास कार्य करे।
वहीं राज्यसभा के मनोनीत सदस्य देश के किसी भी जिले को चुनकर वहां विकास कार्य करवा सकते हैं। इस स्कीम के अंतर्गत सांसद की भूमिक बहुत सीमित होती है, उसे बस जिले के कलेक्टर को कार्य करने की सिफारिश करनी होती है। इस स्कीम के अंतर्गत जो सांसद जितनी निधि खर्च करता है उसके अगले साल उस निधि की लिमिट उतनी ही बढ़ा दी जाती है। लेकिन इस मामले में भी क्रिकेट के मैदान में रनों का अंबार लगाने वाले सचिन तेंदुलकर फिसड्डी साबित हुए हैं। सचिन उन सांसदों में शामिल हैं जिन्होंने पिछले साल अपनी निधि से 10 करोड़ से कम रुपए खर्च किए हैं। सचिन ने पिछले तीन सालों में कुल 14.3 करोड़ के काम की सिफारिश की है जो अपेक्षाकृत बहुत कम है। राज्यसभा वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के आधार पर साल 2013 से अब तक सचिन तेंदुलकर पर बतौर राज्यसभा सांसद 44.14 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं। इस खर्चे में सचिन की सैलरी व अन्य अलाउंस शामिल हैं। सचिन भारत के पहले क्रिकेटर हैं जिन्हें राज्यसभा में सांसद मनोनीत किया गया है। लेकिन क्रिकेट के मैदान में अपनी बेहतरीन बल्लेबाजी से करोड़ों लोगों को अपना मुरीद बनाने वाले सचिन राजनीति की पिच में अब तक कुछ खास नहीं कर सके हैं। बहरहाल, सचिन के पा अभी भी तीन साल बाकी हैं अब शायद वह अपनी ख्याति के अनुरूप देश के लोगों को लाभान्वित करें।
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