5 बातें जो बताती हैं कि धोनी की आरपीएस और गांगुली की पुणे वॉरियर्स एक जैसी टीमें हैं
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भारतीय टीम के दो ऑलटाइम महान क्रिकेट कप्तान सौरव गांगुली और महेंद्र सिंह धोनी ने टीम इंडिया को एक ऐसी टीम के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई जिसने बड़े टूर्नामेंटों में जीत को मुकम्मल करना शुरू किया। लेकिन इसी बीच इन दोनों की कप्तानी में दो विभिन्न कालों में एक कथित रूप से शापित कही जाने वाली पुणे टीम ने ग्रहण लगाया है जिसको लेकर क्रिकेटप्रेमियो के बीच चर्चाओं का दौर चल निकला है। गौरतलब है कि 2012 में पुणे वॉरियर्स टीम के कप्तान सौरव गांगुली थे और उकी टीम को इस साल करारी हार का सामना करना पड़ा था और वही हाल इस साल धोनी की टीम का हुआ है। लेकिन इस बीच इन दोनों टीमों के एक ही तरह से हारने की वजहें भी निकलकर सामने आई है जो चौंकाने वाली हैं। हम आपको इन बिंदुओं से रूबरू कराएंगे जिनके आधार पर आप भी विश्वास करने लगेंगे कि सौरव गांगुली की पुणे और वॉरियर्स और धोनी की पुणे सुपरजाइंट्स एक जैसी टीमें हैं।

1. दोनों कप्तान टीम की अगुआई करने में असफल रहे:

similarities between Sourav Ganguly's Pune Warriors India and MS Dhoni's Rising Pune Supergiants
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साल 2012 में जब युवराज सिंह चोटिल चल रहे थे तो पुणे वॉरियर्स की कप्तानी का दारोमदार सौरव गांगुली को सौंपा गया। गांगुली इस टूर्नामेंट में बेहद फीके साबित हुए और कुल 15 मैचों में 268 रन ही बना सके। इस दौरान उनका रन बनाने का औसत 17.86 का रहा और स्ट्राइक रेट भी 98.89 का रहा जो टी20 के हिसाब से बहुत कम था। वहीं उन्होंने टूर्नामेंट में कुछ ऐसे खराब निर्णय लिए जिन्होंने उनकी टीम को टूर्नामेंट में पिछले कदमों पर ला खड़ा किया। इन खराब निर्णयों में से कुछ निर्णय थे जेसी रायडर और मर्लोन सैम्युअल्स जैसे खिलाड़ियों को ज्यादातर मैचों में अंतिम एकादश में ना खिलाना। 

कुछ उसी अंदाज में धोनी ने भी आईपीएल- 9 में प्रदर्शन किया है और वह अपनी फिनिशर की भूमिका निभाने में पूरी तरह से असफल हुए हैं। इस साल आईपीएल में अभी तक उनका औसत 30 के आसपास जरूर है लेकिन अगर उनके पिछले आईपीएल सीजन के रिकॉर्ड पर नजर दौड़ाएं तो वह उस मुकाबले में कहीं नजर नहीं आते। इसके अलावा उनके कुछ निर्णयों पर बहुत सवाल भी उठे हैं। जिनमें से एक है कि उन्होंने आईपीएल के कई मैचों में रविचंद्रन अश्विन से पूरे ओवर नहीं फिंकवाए। उनके कुछ गेंदबाजी परिवर्तनों को भी बचकाना करार दिया गया क्योंकि वे कोई भी प्रभाव छोड़ने में नाकामयाब रहे।

2. ध्वस्त रही दोनों टीमों की बल्लेबाजी:

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इन दोनों टीमों के ओपनिंग बल्लेबाज कुछ खास नहीं थे। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दोनों टीमों के सलामी बल्लेबाजों का स्ट्राइक रेट 130 से ऊपर ही नहीं था ऐसे में आप तेज तर्रार बल्लेबाजी की आशा कैसे कर सकते हैं? गांगुली और धोनी के लिए रॉबिन उथप्पा और रहाणे ही लगातार रन बनाने वाले बल्लेबाज रहे, दोनों ने टूर्नामेंट में 400 से ज्यादा रन बनाए। लेकिन इनके अलावा और कोई बल्लेबाज प्रभाव छोड़ने में नाकामयाब रहा। धोनी की टीम का औसतन स्ट्राइक रेट 142.72 का रहा है वहीं गांगुली की टीम का औसतन स्ट्राइक रेट 123.93 का रहा था। 

3. अजब है दोनों टीमों का कनेक्शन:

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दोनों टीमों में तीन ऐसे खिलाड़ी हैं जो दोनों टीमों के लिए खेले। इनके नाम स्टीव स्मिथ, अशोक डिंडा, और मिचेल मार्श हैं। हालांकि स्टीव स्मिथ ने दोनों टीमों के लिए अच्छी बल्लेबाजी की है। इस साल स्टीव स्मिथ ने चोटिल होने से पहले आरपीएस के लिए 8 मैच खेले जिस दौरान एक शतक भी मुकम्मल किया। हालांकि बाकी दोनों खिलाड़ी दोनों ही टीमों से कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

4. स्कोर को चेज करने और बचाने का अजीब मामला:

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गांगुली की पुणे वॉरियर्स टीम चेज करने के मामले में बुरी तरह से फेल हुई थी। वह टूर्नामेंट में 8 मैच चेज करते हुए हारी थी जिनमें कुछ करीबी हार भी शामिल है। वहीं दूसरी ओर धोनी की पुणे टीम लक्ष्य बचाने में बुरी तरह से फेल हुई। यहां तक की उनका कमजोर गेंदबाजी आक्रमण 195 जितने बड़े स्कोर को भी नहीं बचा सका। वह 6 मैच स्कोर को ना बचा पाने के कारण हारे। जो बताता है कि दोनों टीमों को फिनिशर की कमी जबरदस्त रूप से खली।

5. खली, एक बड़े ऑलराउंडर खिलाड़ी की कमी:

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टी20 क्रिकेट में हमेशा ही एक अच्छे ऑलराउंडर की जरूरत होती है जो गेंद के साथ- साथ बल्ले से भी अच्छा कमाल दिखा सके। इसका जीतता- जागता उदाहरण ड्वेन ब्रावो, शेन वॉटसन और आंद्रे रसेल जैसे क्रिकेटर हैं जो पिछले कई सीजनों से यह कारनामा करते आ रहे हैं। पिछली बार ब्रावो धोनी की चेन्नई टीम में थे लेकिन इस बार उनकी टीम में ऐसा कोई नहीं था जो ब्रावो जैसे ऑलराउंडर की कमी पूरी कर सकता। वही कहानी गांगुली की टीम के साथ थी और उनकी टीम में किसी भी खिलाड़ी ने अच्छा ऑलराउंड प्रदर्शन नहीं किया। खामियाजन, दोनों बेहतरीन कप्तानो की टीमें बुरी तरह से फेल हुईं।