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मुश्ताक अली: वह क्रिकेटर जिसके लिए दर्शकों ने किया मैच का 'बायकॉट', विदेशी धरती पर शतक लगाने वाला पहला हिंदुस्तानी

सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी यानी SMAT का आगाज हो चुका है. आपमें से शायद कई लोगों को इस बात की जानकारी न हो कि लेकिन यह एक घरेलू टी20 टूर्नामेंट हैं. अब आप सोचेंगे कि क्या सैयद मुश्ताक अली टी20 फॉर्मेट के बड़े प्लेयर थे. तो, इसका जवाब है नही. असल में उन्होंने कभी यह...

user-circle cricketcountry.com Written by Bharat Malhotra
Last Updated on - November 27, 2025 9:21 AM IST

सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी यानी SMAT का आगाज हो चुका है. आपमें से शायद कई लोगों को इस बात की जानकारी न हो कि लेकिन यह एक घरेलू टी20 टूर्नामेंट हैं. अब आप सोचेंगे कि क्या सैयद मुश्ताक अली टी20 फॉर्मेट के बड़े प्लेयर थे. तो, इसका जवाब है नही. असल में उन्होंने कभी यह फॉर्मेट खेला ही नहीं. इतना ही नहीं उन्होंने कभी वनडे क्रिकेट भी नहीं खेला. तो फिर आखिर उनके नाम पर घरेलू टी20 टूर्नामेंट क्यों खेला जाता है. और आखिर ऐसा उनका क्या रिकॉर्ड है जिनकी वजह से उन्हें याद किया जाता है.

1930 और 40 का दशक ऐसा था जब दुनिया विश्व युद्ध की त्रासदी देख रही थी. और क्रिकेट के मैदान पर सर डॉनल्ड ब्रैडमैन का जलवा था. भारत में भी बल्लेबाजी के महान दौर की शुरुआत हो चुकी थी. विश्व युद्ध के साथ-साथ भारत में घरेलू क्रिकेट भी बढ़ रहा था. विजय मर्चेंट और विजय हजारे बल्ले से क्रिकेट का नया इतिहास लिख रहे थे. अंग्रेज भी मान रहे थे कि अब भारत की पहचान बननी शुरू हो गई है.

इस बीच होलकर राज के इंदौर में एक लड़का अपने कमाल के स्ट्रोक्स से मैदान पर रोमांच की कहानियां लिख रहा था. पिता याकूब अली पुलिस इंस्पेक्टर थे लेकिन बेटे को मैदान पर गेंद और बल्ला सुहाता. लोग उसे देख रहे थे और उसके बल्ले के करतबों पर तालियां बजा रहे थे. इंटरनेट, सोशल मीडिया के उस दौर से पहले भी उसकी गजब की फैन-फॉलोइंग थी. प्रेस उसके खेल को सराह रही थी और दर्शक उसका पूरा लुत्फ उठा रहे थे. उसकी दीवानगी ऐसी थी कि जब वह टीम से बाहर हुआ तो लोगों ने मैदान पर विरोध जताना शुरू कर दिया. और अगर ऑर्गनाइजर्स का अहं अडंगा नहीं लगाता तो वह भारत के लिए और भी टेस्ट मैच खेलते. और इस लड़के को ही दुनिया ने सैयद मुश्ताक अली कहा.

तो, चलिए आज इसी पर बात करते हैं. आखिर कौन थे सैयद मुश्ताक अली. अली का जन्म 17 दिसंबर 1914 को इंदौर में हुआ. उनकी बायोग्रफी के फरवर्ड में ऑस्ट्रेलिया के मशहूर ऑलराउंडर कीथ मिलर ने उन्हें क्रिकेट का एरल फ्लिन कहा है. एरल फ्लिन ऑस्ट्रेलियन-अमेरिकन एक्टर थे. लंबे कद के मुश्ताक अली किसी सिने-सितारे जैसे स्टाइलिश थे.

मुश्ताक क्रीज का बहुत अच्छा इस्तेमाल करते थे. वह पिच पर आगे बढ़ने और क्रीज में दाएं-बाएं होकर गेंद का सामना करते. उनके बारे में कहा भी जाता था कि ‘वह सिर्फ तभी स्थिर होते जब वह अंपायर से गार्ड ले रहे होते थे. पर वह यह औपचारिकता भी क्यों करते थे क्योंकि एक बार मार्क लेने के बाद वह उसका कोई ध्यान नहीं रखते थे.’

दिग्गज खिलाड़ी कर्नल सीके नायडू ने उन्हें 1929 में हैदराबाद में आयोजित प्रतिष्ठित बेहराम-उद्-दौला टूर्नमेंट में पहला मौका दिया. नायडू इसके बाद हमेशा से अली के लिए गुरु की तरह रहे. अली ने करियर का आगाज यूं तो बाएं हाथ के धीमी गति के गेंदबाज के रूप में किया लेकिन बाद में उनकी पहचान दाएं हाथ के विस्फोटक सलामी बल्लेबाज की बन गई.

1934 में कोलकाता में इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने अपना पहला टेस्ट मैच खेला. 1936 में इंग्लैंड के खिलाफ ओल्ड ट्रैफर्ड में उन्होंने विजय मर्चेंट के साथ भारत की दूसरी पारी में कमाल की बल्लेबाजी की. दोनों बल्लेबाजों ने इंग्लिश गेंदबाजों की जमकर धुनाई की और सिर्फ 140 मिनट में 203 रन जड़ दिए. इनमें से 112 रन अकेले अली के बल्ले से निकले थे. यह टेस्ट क्रिकेट में उनका बेस्ट स्कोर रहा.

टेस्ट क्रिकेट को अकसर धीमी रफ्तार के खेल के लिए जाना जाता है. लेकिन इसमें भी वह धुआंधार तरीके से रन बनाने में माहिर थे. उन्हें बोरियत भरी बल्लेबाजी से जैसे चिढ़ थी. अपने इंटरव्यू में वह खुद कहा करते थे, ‘मैं दर्शकों के लिए तेज रफ्तार क्रिकेट खेलता था. मैं सोचता था कि दर्शकों ने पैसा खर्च कर मैच का टिकट लिया है इसलिए मुझे मैदान पर कुछ ऐसा कर दिखाना चाहिए कि दर्शक जब स्टेडियम से अपने घर लौटें, तो उनके मुंह से बरबस ही निकल पड़े कि उन्होंने शानदार क्रिकेट देखा है.’

मुश्ताक अली ने कुल 11 ही टेस्ट मैच खेले लेकिन घरेलू क्रिकेट में वह लंबे वक्त तक सक्रिय रहे. 1963-64 में 48 साल की उम्र मे उन्होंने डिफेंस फंड मैच में कई टेस्ट बॉलर्स के खिलाफ 41 रन की पारी खेली थी. इस बीच उन्होंने होलकर के लिए कई रणजी ट्रॉफी फाइनल भी खेले. इसमें 1951-52 में भारत की पहली टेस्ट जीत भी शामिल थी. भारत ने इंग्लैंड को मद्रास में पारी के अंतर से हराकर अपनी पहली टेस्ट जीत भी शामिल थी. वह और भी टेस्ट मैच खेल सकते थे लेकिन सिलेक्शन लेटर में किसी कन्फ्यूजन की वजह से ऐसा नहीं हो सका. दूसरे महायुद्ध के बाद जब ऑस्ट्रेलियन सर्विसेज के खिलाफ कोलकाता में हुए मैच में उन्हें टीम में नहीं रखा गया तो कोलकाता के दर्शकों ने नारे लगाए, ‘नो मुश्ताक, नो टेस्ट.’ यानी मुश्ताक नहीं तो टेस्ट नहीं. 1947-48 में अपने एक भाई के निधन की वजह से वह ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर नहीं गए. 1952 के इंग्लैंड दौरे पर उन्हें टीम में नहीं चुना गया.

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37 साल की उम्र में भी वह वहां उपयोगी होते. पर वह टीम का हिस्सा नहीं थे. मुश्ताक ने 226 फर्स्ट क्लास मैचों में 13213 रन बनाए. इसमें तीस शतक शामिल थे. बाद में मुश्ताक के बेटे गुलरेज अली और पौते अब्बास अली दोनों ने फर्स्ट-क्लास क्रिकेट खेला.