Bharat Malhotra
Bharat Malhotra अभी cricketcountry.com की हिंदी टीम का हिस्सा हैं. भारत के पास डिजिटल मीडिया में करीब 17 साल का अनुभव है. साल 2008 में आ ...Read More
Written by Bharat Malhotra
Last Updated on - January 27, 2026 3:55 PM IST

कर्नाटक की टीम मध्य प्रदेश से हार चुकी थी. और इसके बाद टीम के अगले राउंड में जाने पर सवाल था. उसकी उम्मीद महज एक पतले से धागे से बंधी है. और उम्मीद के इसी ताने-बाने के बीच टीम प्रबंधन चलते रणजी ट्रॉफी सीजन में एक बड़ा फैसला लेता है. दिग्गज बल्लेबाज मयंक अग्रवाल को कप्तानी से हटा दिया जाता है. उनके स्थान पर कमान मिलती है देवदत्त पडिक्कल को. मैच में हार या फॉर्म में गिरावट. अग्रवाल को कप्तानी से हटाने का फैसला यूं ही नहीं लिया गया. इसके पीछे कई चीजें काम कर रही हैं. टीम प्रबंधन की योजनाएं, बदलाव पर काम और आखिरी मैच में हर कीमत पर जीत की दरकार. और इसी वजह से पंजाब के खिलाफ आखिरी मैच से पहले टीम ने बड़ा दांव खेला है. और कहीं-न-कहीं यह सब कर्नाटक की मौजूदा स्थिति से ज्यादा भविष्य की योजनाओं पर ध्यान देने की बात है.
कर्नाटक रणजी ट्रॉफी में मजबूत टीम है. बहुत मजबूत. वह ट्रॉफी में सिर्फ भाग लेने भर के लिए नहीं उतरती. उसके साथ जीत की उम्मीद होती है. चैंपियन बनने का भार. हालांकि टीम ने बीते करीब 11 साल से ट्रॉफी पर कब्जा नहीं किया है. आखिरी बार 2014-15 में कर्नाटक ने तमिलनाडु को हराकर खिताब जीता था. उससे पिछले सीजन में भी वही चैंपियन थी. इस वक्त कर्नाटक से उम्मीदें वाबस्ता होने लगीं. लेकिन नतीजे में उतार-चढ़ाव कायम रहा. टीम हालांकि कभी खिताब नहीं जीत पाई. इस सीजन में भी कर्नाटक मुश्किल में है. ग्रुप बी में उसके 21 अंक हैं. महाराष्ट्र के 24 अंक हैं और मध्य प्रदेश के 22. और अलूर में कर्नाटक की टीम को जो हार मिली उसने टीम की उम्मीदों को काफी नुकसान पहुंचाया. टीम की बल्लेबाजी बुरी तरह नाकाम रही. कप्तानी पर सवाल उठे. रणनीति पर निशाना साधा गया. कुल मिलाकर टीम फंसी रही. कर्नाटक जैसी मजबूत टीम के लिए ये सब सुधारना जरूरी था. और टीम ने इसमें देरी नहीं ही करने का फैसला किया.
मयंक अग्रवाल कमाल के बल्लेबाज हैं. उनके पास अनुभव है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भी खेल चुके हैं. और घरेलू क्रिकेट में उनका रिकॉर्ड साबित हो चुका है. कुल मिलाकर वह कर्नाटक की अगुआई करने के लिए परफेक्ट खिलाड़ी रहे हैं. लेकिन उनका हालिया फॉर्म अच्छा नहीं था. नौ पारियों में 33.11 का औसत और 298 रन. इसमें एक सेंचुरी और दो हाफ सेंचुरी. अगर वह लोअर-मिडल ऑर्डर में खेल रहे होते तो लगता कि यह प्रदर्शन ठीक-ठाक है. लेकिन एक सलामी बल्लेबाज जो कप्तान भी है, उससे ज्यादा की अपेक्षा की जाती है. उसे हर बार पारी का आधार तय करना है.
मध्य प्रदेश के खिलाफ मैच में कर्नाटक की टीम दोनों पारियों में ढह गई. अग्रवाल दोनों पारियों में जल्दी आउट हुए. इससे मिडल-ऑर्डर पर दबाव बढ़ गया. वहीं दूसरी टीम को मौका मिल गया कि वह कर्नाटक पर शिकंजा और कड़ा कर सके. सलामी बल्लेबाज जब कप्तान बनता है तो उस पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है. आप नई गेंद का सामना करते हैं. पिच में मदद होती है और गेंदबाज फ्रेश. और ऐसे में अगर आप असफल हो जाते हैं तो आपकी टीम मनोवैज्ञानिक रूप से दबाव में आती है और विपक्षी टीम को बढ़त मिलती है. और कर्नाटक टीम प्रबंधन को लगा कि यह दबाव बल्लेबाज मयंक अग्रवाल को नुकसान पहुंचा रहा है.
मध्य प्रदेश के खिलाफ हार के बाद कशमकश खत्म हो गई. यह टर्निंग पॉइंट रहा. एमपी ने पहली पारी में 323 रन बनाए. जवाब में कर्नाटक 191 पर ऑल आउट हो गया. वहीं दूसरी पारी में भी कर्नाटक की पारी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. सिर्फ 144 के स्कोर पर. कर्नाटक 217 रन से हारा. यह सिर्फ हार नहीं थी. कर्नाटक की टीम कहीं भी कंट्रोल में नहीं दिखी. सामने वाली टीम की पार्टनरशिप को नहीं रोका गया. कर्नाटक के गेंदबाजों को यह समझ नहीं आ रहा था कि किस लाइन और लेंथ पर गेंदबाजी करनी है. एक मजबूत और परंपरा वाली टीम के लिए यह परिस्थिति चिंताजनक थी.
इस मैच के बाद कर्नाटक की टीम के सामने के सामने विचलित करने वाले सवाल थे. सवाल था कि क्या कप्तानी का जो ढांचा टीम ने तैयार किया हुआ है उसी से तो असली नुकसान नहीं हो रहा है?
पहली नजर में देखें तो इस सीजन में पडिक्कल का रिकॉर्ड भी बहुत अच्छा नहीं है. और उन आंकड़ों को देखकर इस बल्लेबाज को कप्तानी सौंपने पर कुछ लोगों को हैरानी जरूर होगा. उन्होंने सिर्फ दो मैच खेले हैं और सिर्फ 111 रन बनाए हैं. औसत भी सिर्फ 27.75 का है. मध्य प्रदेश के खिलाफ जिस मैच को लेकर सारी चर्चा हो रही है, उसमें पडिक्कल दोनों पारियों में वह खाता भी नहीं खोल पाए थे.
तो, अगर आप सोच रहे हैं कि आखिर पडिक्कल को कप्तानी क्यों दी गई. तो इसका जवाब है कि यह कप्तानी पिछले मैच को देखकर नहीं दी गई है. यह भरोसे का सबूत है. इसके लिए संयम और भविष्य की योजना से जोड़कर देखा जा रहा है. वाइट बॉल क्रिकेट में पडिक्कल ने जो किया है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. विजय हजारे ट्रॉफी में उन्होंने नौ पारियों में 725 रन बनाए. वह इस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ियों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहे. उनका औसत 90.62 का रहा. उनकी बल्लेबाजी में नियंत्रण और धैर्य साफ दिखाई दिया. इसके साथ ही परिस्थितियों के हिसाब से बल्लेबाजी करने की उनकी काबिलियत ने बहुत प्रभावित किया. सिलेक्टर्स को उनमें नेतृत्व की क्षमता दिखी. कर्नाटक के थिंक टैंक को एक लय नजर आई. और यह पडिक्कल के पक्ष में जाता दिखा.
कप्तानी में बदलना यूं ही अचानक नहीं हुआ. कर्नाटक स्टेट क्रिकेट असोसिशन में हाल ही में कुछ बदलाव हुआ. और उसके कुछ सप्ताह बाद ही अग्रवाल की जगह पडिक्कल को चुना गया. नई सिलेक्शन कमिटी की कमान पूर्व ऑलराउंडर अमित वर्मा के हाथों में थी. नए टीम प्रबंधन की ओर से संदेश साफ था. दीर्घकालिक योजना बनाओ. कम वक्त के लिए मत सोचो. पडिक्कल इसमें फिट होते हैं. वह अभी सिर्फ 24 साल के हैं. वह अगली पीढ़ी की टीम को लीड करने के लिए तैयार हैं. टीम प्रबंधन साफ सोच रहा है कि खिलाड़ी को इस भूमिका में आगे बढ़ाया जाए. वह उम्र के साथ-साथ सीखे. बजाय इसके कि उन्हें काफी देर से कप्तानी दी जाए. टीम के भीतर भी यह बात हुई होगी कि यह आगे बढ़ने की प्रक्रिया है. कर्नाटक की टीम ने भले ही बदलाव सीजन के बीच में किया हो. ऐसे वक्त पर जब टीम क्वॉलिफिकेशन की जद्दोजेहद में हो. लेकिन सोच दूरदर्शी है.

पडिक्कल को यूं ही गहरे पानी में नहीं उतारा जा रहा. अग्रवाल उनके साथ रहेंगे. उनके अनुभव से पडिक्कल को सीखने का मौका मिलेगा. इससे इस युवा कप्तान को फायदा होगा. दूसरी ओर कर्नाटक का यह प्राइम बल्लेबाज कप्तानी से हटकर सिर्फ बल्लेबाजी पर ध्यान दे सकेगा. और अगर अग्रवाल रन बनाएंगे तो इससे कर्नाटक को फायदा ही फायदा है. एक तो टीम को अच्छी शुरुआत मिलेगी, वहीं दूसरी ओर पडिक्कल की कप्तानी को भी फायदा होगा. पडिक्कल मिडल-ऑर्डर में खेलते रहेंगे जहां से वह मैच को अपने हिसाब से लेकर चल पाएंगे.
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