रिद्धिमान साहा ने कोलकाता की असमान उछाल वाली मुश्किल विकेट पर नाबाद 54 और नबााद 58 रन बनाए © AFP
रिद्धिमान साहा ने कोलकाता की असमान उछाल वाली मुश्किल विकेट पर नाबाद 54 और नबााद 58 रन बनाए © AFP

मेलबर्न टेस्ट 2014 के बाद जब भारत के विकेटकीपर महेन्द्र सिंह धोनी ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास की घोषणा की थी तो हर क्रिकेट प्रेमी के जेहन में सिर्फ एक सवाल था कि टेस्ट में अब भारतीय टीम में विकेटकीपर की भूमिका किसको दी जाएगी। क्या वो दिनेश कार्तिक होंगे या रिद्धिमान साहा या कोई नया युवा चेहरा। चयनकर्ताओं ने कार्तिक या किसी नए चेहरे को मौका नहीं देकर साहा को आजमाने का निर्णय लिया। धोनी टेस्ट में भले ही वनडे जितने बेहतर साबित ना हुए हो लेकिन साहा के लिए उनकी जगह भरना बेहद मुश्किल था।

मगर साहा ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए धोनी की जगह लेने के लिए पूरी कोशिश में लग गए। उनकी विकेटकीपिंग की तारीफ तो पहले से ही होती रही थी लेकिन एक बल्लेबाज के रूप में साहा ने अब तक कुछ खास नहीं किया था। धोनी के बाद ऑस्ट्रेलिया दौरे पर खेले एकमात्र टेस्ट में साहा ने 35 और 0 का स्कोर बनाया। यानी बल्लेबाज के रूप में उनको अभी अपने खेल में बहुत ज्यादा सुधार की जरूरत थी। बांग्लादेश के अगले दौरे में भी उनका बल्ला रूठा रहा। हां श्रीलंका में जरूर उन्होंने दो अर्धशतक जमाए, लेकिन एक बल्लेबाज के रूप में स्थापित करने के लिए ये काफी नहीं था।

2015 में साउथ अफ्रीकी टीम जब भारत आई तो लोगों को उम्मीद थी कि साहा अपने घरेलू मैदानों पर अच्छा प्रदर्शन कर खुद को एक बेहतर बल्लेबाज साबित कर पाएंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और साउथ अफ्रीका के खिलाफ 4 टेस्ट मैचों में उनके बल्ले से एक भी अर्धशतक नहीं निकला। विकेट के पीछे तो उनका प्रदर्शन अच्छा था लेकिन विकेट के आगे उनका बल्ला अभी भी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पा रहा था। शांत स्वभाव के इस विकेटकीपर बल्लेबाज ने अपनी बल्लेबाजी को सुधारने की कोशिश जारी रखी और उनके इस कठिन परिश्रम का ईनाम उन्हें वेस्टइंडीज दौरे पर मिला। साहा ने पहले दो टेस्ट में शतक या अर्धशतक तो नहीं बनाया लेकिन उनके बल्ले से 40 और 47 का स्कोर बनाया। [Also Read: जब मैदान छोड़कर टॉयलेट भागे महेन्द्र सिंह धोनी ]

विकेट के पीछे लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे साहा ने वेस्टइंडीज के खिलाफ तीसरे टेस्ट में विकेट के आगे भी बेहतरीन प्रदर्शन किया और अपने टेस्ट करियर का पहला शतक बनाया। इस शतक ने उन्हें एक बल्लेबाज के रूप में भी पहचान दिलाई, इस टेस्ट में साहा जब बल्लेबाजी करने उतरे तब भारत अपने चोटी के 5 बल्लेबाजों को 126 रनों पर गंवा चुका था। साहा ने अश्विन के साथ मिलकर 213 रनों की साझेदारी निभाई और भारत को मुश्किल परिस्थिति से बाहर निकाला।  [Also Read: जब गौतम गंभीर ने अपना ‘मैन ऑफ द मैच’ खिताब विराट कोहली को दे दिया]

इसके बाद साहा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक बल्लेबाज के रूप में अपनी पहचान बनाने की शुरूआत कर दी। साहा ने खासकर मुश्किल परिस्थितियों में अच्छी बल्लेबाजी करने वाले बल्लेबाज के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं। न्यूजीलैंड के खिलाफ दूसरे टेस्ट में साहा ने जिस तरह की बल्लेबाजी की वो काबिले तारीफ रही। दूसरे टेस्ट की पहली पारी में जब रहाणे वापस पवेलियन लौटे तो भारत 200 रनों पर 6 विकेट गंवा चुका था, कोलकाता की पिच पर पहले दिन ये स्कोर पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम के लिए किसी भी लिहाज से अच्छा नहीं था।

आठवें नंबर पर बल्लेबाजी करने उतरे साहा ने पहली पारी में पहले अश्विन और बाद में पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ मिलकर छोटी छोटी साझेदारियां निभाते हुए भारत का स्कोर 316 पहुंचाया। साहा इस स्कोर को और आगे बढ़ाते लेकिन उनका साथ निभाने के लिए कोई बल्लेबाज नहीं था। इस तरह साहा पहली पारी में 54 के स्कोर पर नाबाद पवेलियन लौटे। दूसरी पारी में भारत की स्थिति और खराब थी जब साहा बल्लेबाजी के लिए मैदान पर आए तो भारत 106 रनों पर अपने 6 विकेट गंवा चुकी थी।

विकेट में असमान उछाल थी गेंद कभी नीची रहती तो कभी अचानक से सिर के ऊपर तक उछलती थी। साहा ने इस मुश्किल विकेट पर टिकने का दम दिखाया। कई गेंद शरीर पर भी झेली लेकिन विकेट नहीं छोड़ा और रोहित शर्मा के साथ शतकीय साझेदारी निभाई। ये साझेदारी दूसरी पारी में भारत की ओर से सबसे बड़ी साझेदारी थी। रोहित के जानें के बाद साहा ने फिर से पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ मिलकर भारत को 263 के सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया। दूसरी पारी में भी साहा 58 रनों पर नाबाद लौटे।

इस टेस्ट में उन्होंने अपनी बल्लेबाजी के स्तर को काफी ऊंचा उठाया और मुश्किल विकेट पर अच्छी बल्लेबाजी करने वाले खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाई। विकेट के पीछे भी उन्होंने असमान उछाल वाले इस विकेट पर कमाल की कीपिंग की। उनके इस शानदार प्रदर्शन की वजह से भारतीय टीम को 178 रनों से जीत हासिल हुई। साहा को मैन ऑफ द मैच चुना गया।

साल 2016 में साहा ने जिस तरह का प्रदर्शन किया है उससे लोगों को ये उम्मीद जगी है कि भारत को अभी कुछ और सालों तक टेस्ट क्रिकेट में विकेटकीपर बल्लेबाज ढूढने की जरूरत नहीं है। साहा विकेटकीपर और बल्लेबाज दोनों के रूप में धोनी की जगह को अपना चुके हैं। विकेटों के पीछे उनका प्रदर्शन बेहतर है तो विकेट के आगे भी उनके प्रदर्शन में मैच दर मैच सुधार आ रहा है।