युवराज सिंह  © Getty Images
युवराज सिंह © Getty Images

साल 2012 में के अंत में युवराज सिंह ने कैंसर से उबरने के बाद वापसी की थी। लेकिन साल 2013 उनके करियर के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं रहा और वह पूरे साल में 18.53 की औसत से महज 278 वनडे रन ही बना सके। ये रन 16 पारियों में आए थे जिसमें दो अर्धशतक और चार बार शून्य पर आउट होना शामिल था। युवराज की इसी फॉर्म के कारण चयनकर्ताओं ने उन्हें न्यूजीलैंड के खिलाफ 2014 दौरे के लिए टीम से बाहर कर दिया था। अब तीन साल के बाद युवराज फिर से वनडे टीम में वापस आए हैं। इस दौरान उन्होंने रणजी सीजन में 5 मैचों में 84 के औसत से 672 रन बटोरे हैं जिसमें 260 और 177 की बड़ी पारियां शामिल हैं। एक तरह से युवराज की फॉर्म के हिसाब से ये अच्छी बात है जो बताता है कि युवराज के दिन अभी पूरे नहीं हुए हैं। और चयनकर्ताओं ने उन्हें प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अच्छे रन बनाने के कारण टीम में जगह दी है।

चयनकर्ताओं का मानना है कि अगर युवराज 260 व 170 के ऊपर की पारियां खेल सकते हैं तो ये बताता है कि उनमें रन बनाने की भूख अभी भी बाकी है। लेकिन ये भी गौर करने वाली बात है कि युवराज में कभी भी रन बनाने की भूख की कमी नहीं थी। जबसे उन्हें वनडे टीम से बाहर किया गया था उन्होंने लगातार घरेलू क्रिकेट में बड़े स्कोर बनाए। 2014-15 घरेलू सीजन में उनका औसत 55.91 रहा था और इस साल उन्होंने तीन लगातार शतक जड़े थे। वहीं 2015-16 भले ही उनके लिए बहुत बढ़िया न रहा हो लेकिन गुजरात के खिलाफ 233 गेंदों में जमाए गए 187 रनों ने सब बराबर कर दिया। जितने दिन तक वह वनडे टीम से बाहर रहे उन्होंने किसी को ये शंका करने का अवसर नहीं दिया कि वह प्रथण श्रेणी मैच में अंत तक जमे रह सकते हैं और प्रथण श्रेणी गेंदबाजी की धज्जियां उड़ा सकते हैं। [ये भी पढ़ें: जब ग्लेन मैक्ग्रेथ पर बरस पड़े थे सचिन और युवराज, भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 20 से रनों से हराया था मैच]

क्वालिटी गेंदबाजी के खिलाफ कमजोर हैं युवराज सिंह: साल 2013 में जब टीम इंडिया ने युवराज को टीम से बाहर किया था तो उसका सबसे बड़ा कारण उनका उच्च गुणवत्ता वाली गेंदबाजी के खिलाफ अच्छा न कर पाना था। साल 2012-13 में युवराज पूरी तरह से सहज नजर नहीं आए थे। साल 2013 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे सीरीज में युवराज ने चार पारियों में 4.75 के औसत से 19 रन बनाए थे और इस दौरान वह तीन मौकों पर मिचेल जॉनसन का शिकार बने थे जिन्होंने युवी को तीन अलग- अलग तरीकों से आउट किया था। पुणे में वह बाउंसर पर आउट हुए थे, मोहाली में गेंद ने बल्ले का बाहरी किनारा लिया था, वहीं नागपुर में एक सीधा इनस्विंगर ने उन्हें क्लीन बोल्ड कर दिया था। हर सभी मौकों पर युवराज बुरी तरह गेंद से बीट हुए थे।

इन सालों में भले ही चयनकर्ताओं ने उन्हें वनडे में नकारा लेकिन टी20I में चुनते रहे। वह टी20 विश्व कप 2014 में भारत की ओर से सभी मैच खेले और शायद वह साल 2016 में भी सभी खेलते अगर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ क्वार्टरफाइनल में उनका टखना नहीं मुड़ता। वह इन दोनों टूर्नामेंट में जूझते नजर आए थे, साल 2014 में जहां उनका स्ट्राइक रेट 98.03 का रहा। वहीं 2016 में यही स्ट्राइक रेट कुल 100 का रहा। ये किसी सरप्राइज से कम नहीं था कि साल 2014 के फाइनल में खराब प्रदर्शन के बाद युवराज कि साल 2016 में टी20 विश्व कप के लिए वापसी हुई।

युवाओं को नकारकर युवराज को टीम में चुनना गैर जरूरी: अब एक बार फिर से युवराज टीम में वापस आ गए हैं। इस बार वह सिर्फ टी20 में ही नहीं बल्कि वनडे में वापस आए हैं। जाहिर है कि युवराज का चुनाव करना तब गैर जरूरी नहीं होता अगर भारतीय क्रिकेट युवा क्रिकेटर पैदा करने में असमर्थ होता। ऐसा तो कतई है नहीं बल्कि युवाओं की तो यहां भरमार है। मंदीप सिंह, युवराज सिंह के पंजाब टीम- मेट, भारतीय टीम के अंतिम वनडे सीरीज में अंग थे। लेकिन उन्हें कोई मौका नहीं मिला और अब वह वनडे टीम से बाहर हैं। करुण नायर जिन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ अंतिम टेस्ट मैच में तिहरा शतक जमाया और आईपीएल में कई सालों से खेल रहे हैं उन्हें भी मौका नहीं मिला। वहीं बात करें रिषभ पंत की तो उन्होंने तो रणजी सीजन में युवराज सिंह से भी ज्यादा रन बनाए। जी हां उन्होंने रणजी सीजन में 81.00 की औसत 107.28 के स्ट्राइक रेट के साथ 972 रन बनाए, लेकिन उन्हें वनडे टीम में तो मौका नहीं दिया गया। गौर करने वाली बात है कि रिषभ ने इस दौरान चार शतक और एक तिहरा शतक जड़ा।

मंदीप और पंत को टी20I टीम में जगह दी गई है। लेकिन चीफ सिलेक्टर ने इस बात की भी घोषणा कर दी कि उनके पैनल ने इसलिए यूथफुल टी20 स्क्वाड को चुना है क्योंकि हाल फिलहाल में कोई मुख्य टूर्नामेंट नहीं है। वनडे की परिस्थिति अलग है क्योंकि चैंपियंस ट्रॉफी पांच महीने दूर है।

चयनकर्ता, संभवतया युवराज सिंह को बतौर अनुभवी युवा खिलाड़ियों की जगह चुनने की विडंबना को नहीं समझ पाए हैं। गौर करने वाली बात है कि युवराज ने भी अपना डेब्यू साल 2000 में चैंपियंस ट्रॉफी से ही किया था जिसमें वह एक उदीयमान खिलाड़ी के रूप में खूब चमके थे। इस दौरान उन्होंने अपनी पहली पारी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 84 रन बनाकर सभी को अपना मुरीद बना लिया था। साल 2000 में ये टूर्नामेंट अंडर-19 विश्व कप के पूरे 9 महीने बाद आयोजित किया गया था जिसमें युवराज सिंह खेले थे। ऐसे में सिलेक्टर्स को ये सोचने की जरूरत है कि अनुभव का ताना- बाना जोड़कर युवाओं की जगह 35 साल के युवराज सिंह को टीम में शामिल किया जाना सही है या गलत?