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नहीं बदलेगा 'अंपायर्स कॉल' का नियम, अनिल कुंबले की अध्यक्षता वाली कमेटी ने ICC को कहा 'न'

LBW डिसीजन पर जब DRS मांगा जाता है तो कई मौकों पर 'अंपायर्स कॉल' के चलते फैसला सटीक नहीं दिखता. ऐसे में विराट कोहली, सचिन तेंदुलकर समेत कई दिग्गज खिलाड़ी इस नियम को हटाने पर जोर दे रहे थे.

user-circle cricketcountry.com Written by India.com Staff
Last Published on - March 24, 2021 2:10 PM IST

पिछले कुछ दिनों से क्रिकेट मैदान पर DRS (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) में अंपायर्स कॉल (Umpies Call) का डिसीजन काफी चर्चा में रहा है. किसी एक ही डिसीजन पर LBW आउट के लिए अगर मैदानी अंपायर सहमत हो तो उसे आउट करार दिया जाता और अगर मैदानी अंपायर सहमत न हो तो उसे नॉट आउट करार दिया जाता है. ऐसे में भारतीय कप्तान विराट कोहली (Virat Kohli) ही नहीं बल्कि महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) भी इसकी आलोचना कर चुके हैं. उनका कहना है कि या तो तकनीक पर 100% भरोसा करना चाहिए या फिर बिल्कुल भी नहीं.

सचिन और कोहली ही नहीं बल्कि क्रिकेट जगत की कई और नामचीन हस्तियां DRS में अंपायर्स कॉल के समर्थन में नहीं हैं. इन दिग्गजों का कहना है कि अगर टीवी कैमरा पर गेंद बेल्स को छू भी रही है, तो भी बल्लेबाज को आउट ही करार दिया जाना चाहिए. इसमें 50-50 करार देकर उसे नॉट आउट देना गलत है. हालांकि भारत के पूर्व दिग्गज लेग स्पिनर अनिल कुंबले (Anil Kumble) की अध्यक्षता वाली क्रिकेट कमेटी मौजूदा नियम को सही मानती है और उसन आईसीसी से इसमें कोई बदलाव नहीं करने की मांग की है.

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ईएसपीएन क्रिकइन्फो की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अनिल कुंबले की अध्यक्षता वाली क्रिकेट कमेटी ने इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) से सिफारिश की है कि DRS पर अंपायर्स कॉल के नियम में कोई बदलाव की जरूरत नहीं है. इस क्रिकेट कमेटी में अनिल कुंबले के अलावा पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़, माहेला जयवर्धने, एंड्र्यू स्ट्रॉस और शॉन पोलक समेत कई अन्य दिग्गज खिलाड़ी शामिल हैं.

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इस रिपोर्ट में बताया गया है कि समिति इस निर्णय पर ब्रॉडकास्टर्स, मैच अधिकारियों और हॉक आई से जुड़े एक्सपर्ट्स से विचार-विमर्श करने के बाद इस निर्णय पर पहुंची है कि इस नियम में बदलाव की जरूरत नहीं है. इसके बाद यह साफ है कि कई दिग्गज खिलाड़ियों की आलोचना के बाद भी अंपायर्स कॉल का नियम फिलहाल बदलने नहीं जा रहा.

बता दें अंपायर्स कॉल का यह निर्णय इसलिए रखा गया है क्योंकि तकनीक पर भी 100 फीसदी भरोसा नहीं किया जा सकता. कई करीबी मामलों में इसके पूर्ण रूप से सही होने के सबूत नहीं मिलते. ऐसे में मैदान अंपायर के निर्णय को सर्वोपरि माना गया है.