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IND vs PAK: इनकार, लंच से शुरू हुई 'दुश्मन' भारत-पाक की वो 'जुगलबंदी', जो हिला देती है वर्ल्ड क्रिकेट!
Ind vs Pak के बीच की दुश्मनी जैसा कोई उदाहरण नहीं है. लेकिन दोनों में सीक्रेट दोस्ती भी है, जिसने वर्ल्ड क्रिकेट को बदलने का काम किया है.
Written by Kuldeep Singh Panwar
Last Updated on - September 14, 2025 11:33 PM IST

India Vs Pakistan: भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का मैदान हो या सरहद का मोर्चा, हर जगह महज दुश्मनी के अलावा आपको कुछ नहीं दिखाई देगा.महज 78 साल पहले तक जमीन का एक ही टुकड़ा रहे इन दोनों देशों में जितना आपसी भाईचारे और सौहार्द का शोर मचाया जाता है, उतना ही इन दोनों के बीच दुश्मनी की लकीर और गहरी होती दिखाई देती है. हालांकि क्रिकेट को दोनों देशों को जोड़ने वाला पुल माना जाता रहा है और दोनों ही तरफ से इन 78 साल के दौरान जमकर ‘क्रिकेट पॉलीटिक्स’ भी हुई है. इसके बावजूद दोनों देशों के बीच ‘दोस्ती’ होने की संभावना को उतना ही असंभव माना जाता है, जितना इंसान का किसी दूसरे ग्रह पर जाकर बसना. एशिया कप 2025 (Asia Cup 2025) इसका जबरदस्त उदाहरण है, जिसमें दोनों टीम के बीच मैच के लिए पहलगाम आतंकी हमले (Pahalgam Terror Attack) का हवाला देकर भारत में बायकॉट कैंपेन तक चलाया गया है. दोनों देशों के बीच कट्टर दुश्मनी की हद इतनी है कि एशिया कप 2025 की शुरुआत से पहले औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी दोनों टीमों के कप्तान आपस में हाथ मिलाकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने की कोशिश करते दिखाई नहीं दिए हैं.
इसके बावजूद यदि हम कहें कि दोनों देशों की ‘क्रिकेट दोस्ती’ ऐसा फैक्टर है, जिसका जलवा जब भी दिखाई देता है तो पूरी वर्ल्ड क्रिकेट को हिला देता है तो आप क्या कहेंगे? दरअसल हम बात कर रहे हैं भारत-पाकिस्तान के इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) में किसी भी मुद्दे पर साथ मिलकर वोटिंग करने वाली दोस्ती की, जिसमें एशिया के बाकी छोटे देश यानी श्रीलंका, बांग्लादेश, यूएई, ओमान, हांगकांग, नेपाल आदि भी उन्हें फॉलो करते हैं. इस दोस्ती ने क्रिकेट की ताकत कहे जाने वाले इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को कई बार फैसले बदलने पर मजबूर किया है. इस दोस्ती की शुरुआत 1983 वर्ल्ड कप में एक ‘इनकार और लंच’ से हुई थी, जिसके बाद वो ‘दोस्ती’ सामने आई, जिसने क्रिकेट का सबसे बड़ा आयोजन यानी वर्ल्ड कप पहली बार इंग्लैंड के शिकंजे से ऐसा बाहर निकाला कि उसे वापस अंग्रेजों की धरती पर लौटने में 16 साल लग गए. चलिए इस इनकार और लंच की दास्तां आपको बताते हैं.

भारत के 1983 वर्ल्ड कप में जोरदार प्रदर्शन ने रखी नींव
साल 1975 और 1979 के वर्ल्ड कप में टीम इंडिया जिस तरह से खेली थी, उसके बाद 1983 के वर्ल्ड कप में सट्टेबाज उस पर निगेटिव में भी भाव लगाने को तैयार नहीं थे. सभी मान रहे थे कि यह वर्ल्ड कप भारतीय टीम के लिए महज सैर-सपाटा है. लेकिन भारत ने सारे अनुमान ध्वस्त कर दिए और फाइनल में पहुंच गया. यही बात भारत-पाकिस्तान की उस दोस्ती की नींव रखने का कारण बनी, जिसकी हम बात कर रहे हैं. दरअसल भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) के तत्कालीन अध्यक्ष एनकेपी साल्वे ने इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड (ECB) से फाइनल के दो अतिरिक्त पास मांगे. ECB ने उनका आग्रह ताना मारते हुए ठुकरा दिया. यह ‘इनकार’ साल्वे को बेहद खल गया.
भारत ने जीता फाइनल और फिर हुआ वो ‘लंच’
भारत ने वर्ल्ड क्रिकेट का सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए 25 जून, 1983 को फाइनल मुकाबले में उस वेस्टइंडीज को हरा दिया, जिसने पिछले दोनों वर्ल्ड कप जीते थे और उस समय भी चैंपियन मानी जाती थी. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के तत्कालीन अध्यक्ष एयरचीफ मार्शल नूर खान ने भी भारत और पाकिस्तान को अतिरिक्त टिकट नहीं देने का विरोध किया था. पाकिस्तान क्रिकेट पर लिखी गई किताब ‘वुंडेड टाइगर’ में पीटर ओबोर्न ने इस बात का जिक्र किया है. उन्होंने लिखा कि फाइनल मैच से अगले दिन साल्वे और खान ने एकसाथ लंच किया. नूर खान ने अगला वर्ल्ड भारत-पाकिस्तान में कराने का प्रस्ताव रखा, जिस पर साल्वे ने तत्काल हां बोल दिया.

राजनीतिक रूप से भी मजबूत होना आया काम
साल्वे को गांधी परिवार के करीबी माना जाता था और बाद में वे राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर कैबिनेट मिनिस्टर भी बने. दूसरी तरफ नूर खान को पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जनरल जिया उल हक का दायां हाथ माना जाता था. दोनों राजनीतिक रूप से मजबूत थे, जिसके चलते उन्हें तत्काल वर्ल्ड कप को इंग्लैंड से बाहर लाने के प्रस्ताव पर काम करने की हरी झंडी मिल गई.
ICC मतलब इंग्लैंड होता था उस समय
उस समय इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया के पास ICC में वीटो पॉवर थी यानी वे चाहें तो किसी भी प्रस्ताव को बिना वोटिंग खारिज कर सकते थे. आईसीसी पर पूरी तरह इंग्लैंड का कब्जा था. इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष खुद ब खुद आईसीसी अध्यक्ष बन जाता था. ऐसे में इंग्लैंड से वर्ल्ड कप की मेजबानी छीनना बेहद टेढ़ी खीर था, क्योंकि परंपराओं के नाम पर इंग्लैंड ऐसा कोई भी कदम उठाने का विरोध करता था और ऑस्ट्रेलिया उसका साथ देता था.
एशियाई देशों की एकता ने खोला दरवाजा
नूर खान और साल्वे ने 1983 में ही पहली एशियाई क्रिकेट कॉन्फ्रेंस आयोजित की, जिसमें वर्ल्ड कप के आयोजन के प्रस्ताव को क्रिकेट खेलने वाले सभी एशियाई देशों ने सैद्धांतिक मंजूरी दे दी. इसके बाद एशियाई क्रिकेट काउंसिल (ACC) की स्थापना की गई, जिसमें भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका के साथ ही आईसीसी के एसोसिएट मेंबरों बांग्लादेश, मलेशिया और सिंगापुर को भी संस्थापक सदस्य बनाया गया. ACC की तरफ से भारत-पाकिस्तान की संयुक्त मेजबानी का प्रस्ताव आईसीसी को भेजा गया, जिसे पहले तय अनुमानों के हिसाब से ही कानूनी आपत्तियां जताते हुए ICC ने खारिज कर दिया. इसके बाद वर्ल्ड कप लेने के लिए भारत-पाकिस्तान जॉइंट मैनेजमेंट कमेटी गठित की गई, जिसमें नूर खान ने एनकेपी साल्वे को ही अध्यक्ष बनने को कहा. इस कमेटी में आईएस बिंद्रा सचिव थे, जबकि जगमोहन डालमिया भी इसका हिस्सा थे. बाद में डालमिया और बिंद्रा ने ही वर्ल्ड क्रिकेट को 90 के दशक में भारतीय क्रिकेट की वो असली ताकत दिखाई थी, जिसके चलते आज बीसीसीआई दुनिया की सबसे ताकतवर खेल संस्थाओं में गिना जाता है.

और एसोसिएट देशों की नाराजगी आई काम
बिंद्रा और डालमिया ने सबसे पहले एसोसिएट देशों को इंग्लैंड के खिलाफ साथ देने के लिए तैयार किया, जिनका 1-1 वोट आईसीसी में होता था. टेस्ट मैच खेलने वाले 8 देशों पर 16 वोट थे, जबकि कुल 37 वोट में बाकी एसोसिएट देशों के थे. इंग्लैंड एसोसिएट देशों को बोझ मानता था, जिसके चलते आईसीसी से मिलने वाली मदद में महज 40 फीसदी हिस्सेदाी ही एसोसिएट देशों के लिए रखी गई थी. इसके चलते एसोसिएट देश इंग्लैंड से नाराज थे और यही नाराजगी भारत-पाकिस्तान के पक्ष में वोट में बदली गई. इसके बाद इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया की आपसी एकता तोड़ी गई. डालमिया ने आईसीसी को भेजे प्रस्ताव में 1987 के वर्ल्ड कप की मेजबानी भारत-पाकिस्तान को देने के बाद 1992 की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया को देने की बात कह दी. इससे ऑस्ट्रेलिया भी भारत-पाकिस्तान के फेवर में आ गया.
वोटिंग में दिखा जब ऐसा मजाकिया नजारा
वर्ल्ड कप के लिए जब वोटिंग हुई तो भारत-पाकिस्तान ने 16-12 से इंग्लैंड को हरा दिया. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, इंग्लैंड ने पाकिस्तानी प्रतिनिधि नसीम हसन शाह की वोट नहीं दिखाई देने की बात कही, जिसे बाद में पाकिस्तान के चीफ जस्टिस बने शाह ने अपने छोटे कद का मजाक उड़ाने की कोशिश माना. दोबारा वोटिंग हुई और अपनी बारी आने पर गुस्से में शाह ने मेज पर चढ़कर खड़े होते हुए दोनों हाथ हवा में उठाकर भारत-पाकिस्तान के पक्ष में वोट देने की बात कही.

पीएम के बराबर में सीट के लिए अंबानी ने खर्च कर दिए 7 करोड़ रुपये
वर्ल्ड कप की मेजबानी पाने की राह में एक बड़ी परेशानी स्पॉन्सर की भी थी, जिससे वर्ल्ड कप में आने वाली टीमों को गारंटी मनी दी जा सके और प्रस्ताव में बड़ी इनामी राशि रखकर इंग्लैंड को पछाड़ा जा सके. इसके लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन धीरूभाई अंबानी से आग्रह किया गया. धीरूभाई ने एक शर्त पर टाइटल स्पॉन्सर बनने की हामी भरी. उनकी शर्त थी कि वर्ल्ड कप से पहले भारत-पाकिस्तान के बीच प्रदर्शनी मैच आयोजित होगा, जिसका दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण होगा और उसमें वे प्रधानमंत्री के बराबर वाली सीट पर बैठेंगे. यह शर्त मानी गई तो उन्होंने आयोजन समिति को 7 करोड़ रुपये की स्पॉन्सरशिप दी. इस रकम ने भारत-पाकिस्तान को इंग्लैंड पर इनामी राशि में दोगुनी बढ़त दिला दी और फिर वो इतिहास रचा गया, जिसने वर्ल्ड क्रिकेट को ही बदल दिया. यह इतिहास था वर्ल्ड कप का पहली बार इंग्लैंड से बाहर आयोजित होना. उसके मैचों का 60-60 ओवर के बजाय घटाकर 50-50 ओवर का होना.
लगातार दिखती रही है दोनों देशों की ‘दोस्ती’ की ताकत
भारत-पाकिस्तान की दोस्ती की यह ताकत इसके बाद हर मुद्दे पर आईसीसी में दिखाई देती रही है. चाहे 1996 के वर्ल्ड कप का आयोजन फिर से भारत-पाकिस्तान और श्रीलंका में कराना हो या आईसीसी के मुनाफे में सदस्य देशों को ज्यादा हिस्सेदारी मिलने का मामला. ऑस्ट्रेलिया में अंपायरिंग विवाद हों या गेंदबाजों के एक्शन पर उठाई जाने वाली आपत्ति. हर बार भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान ने भारत का साथ दिया है, जिसका नतीजा ये रहा है कि वर्ल्ड क्रिकेट को आखिरकार इस ‘दोस्ती’ के सामने ही झुकना पड़ा है.
