© Getty Images
© Getty Images

पल्लेकेले वनडे में टीम इंडिया श्रीलंका के खिलाफ एक समय हार की कगार पर नजर आ रही थी। इस वक्त एमएस धोनी ने मोर्चा संभाला। उनका साथ निभाने के लिए एक ऐसा बल्लेबाज दूसरे छोर पर था जिसने इसके पहले कभी वनडे क्रिकेट में अर्धशतक नहीं लगाया था। हां, टेस्ट क्रिकेट में जरूर उसने 3 अर्धशतक लगाए थे। धोनी इस बात को भलीभांति जानते थे कि उन्हें टीम इंडिया को अगर जीत दिलवानी है तो दूसरे छोर से पूरा साथ मिलना जरूरी है। धोनी ने फंसे हुए मैच में ही भुवनेश्वर को कोचिंग देना शुरू की।

वह उन्हें खूब स्ट्राइक दे रहे थे और ज्यादा से ज्यादा गेंदें खेलने को कह रहे थे। वह इसलिए ताकि भुवनेश्वर गेंदबाजों के खिलाफ आत्मविश्वास हासिल कर सकें। भुवनेश्वर ने शुरुआती 18 रन 59 गेंदों में बनाए थे। यह धोनी की मैदानी कोचिंग का ही नतीजा था। वह उनसे हर गेंद के बाद बात करते थे और किस तरह के स्ट्रोक खेलने हैं ये समझाते रहे।

बाद में भुवी ने अपना गीयर बदला और चौके के साथ छक्का भी मारा और दोनों ने आठवें विकेट के लिए रिकॉर्ड शतकीय साझेदारी निभाते हुए भारत को मैच 3 विकेट से जितवा दिया। इस दौरान भुवनेश्वर ने अपने वनडे करियर का पहला अर्धशतक भी लगाया। जब टीम इंडिया मैच जीती उस वक्त भुवनेश्वर 80 गेंदों में 53 रन बनाकर नाबाद थे। वहीं एमएस धोनी ने भुवनेश्वर से कम गेंदें खेली थीं और वह 68 गेंदों में 45 रन बनाकर नाबाद थे। भुवनेश्वर कुमार ने कहा, “हम जल्दी जल्दी काफी सारे विकेट गिरने के कारण ड्रेसिंग रूम में काफी परेशान थे। हमें दनंजया की गेंदें खेलने में परेशानी हो रही थी क्योंकि यह नहीं समझ पा रहे थे कि गेंद किस ओर टर्न होगी।” [ये भी पढ़ें: कठिन टेस्ट पास करके अच्छा लगा: विराट कोहली]

भुवनेश्वर ने आगे कहा, “जब मैं बैटिंग करने को गया, मैं इस पर ध्यान केंद्रित कर रहा था कि दनंजया की रॉन्ग वन को छोड़ूं और अपना स्वभाविक गेम खेलूं। मुझे लगता है कि अपने स्वभाविक गेम पर ध्यान केंद्रित करना ही काम कर गया। और फिर जाहिरतौर पर दूसरे छोर से एमएस धोनी भी मेरे लिए काफी मददगार थे। जब उनके जैसा कोई खिलाड़ी आपके साथ बैटिंग करता है तो हमेशा लाभ होता है। मैं जाहिरतौर पर टीम के अन्य बल्लेबाजों की तरह बैटिंग नहीं कर सकता, लेकिन बैटिंग को मैंने हमेशा गंभीरता से लिया है। मैंने हमेशा इस पर काम किया है।”