Sourav Ganguly remembers Natwest final when he failed to stop rampant Virender Sehwag
(File photo)

भारतीय क्रिकेट टीम की इतिहास की सबसे शानदार जीतों में से एक है साल 2002 की नेटवेस्ट ट्रॉफी। लॉर्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए फाइनल मैच में 326 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए 2 विकेट से जीत हासिल की थी। मैच के नायक युवराज सिंह (69) और मोहम्मद कैफ (87) थे लेकिन वीरेंद्र सहवाग और सौरव गांगुली की 106 रनों की सलामी साझेदारी ने भी खिताबी जीत में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि इस साझेदारी के दौरान गांगुली और सहवाग के बीच हल्की नोकझोंक हुई थी।

पूर्व भारतीय कप्तान ने यू-ट्यूब चैट के दौरान बताया कि उस मैच के दौरान वो सहवाग के आक्रामक रवैए से नाराज हुए थे लेकिन बाद में उन्हें समझ आ हया कि सहवाग को रोकने का कोई तरीका नहीं है।

गांगुली ने कहा, “हमें फाइनल मुकाबले में 325 रनों के लक्ष्य का पीछा करना था। जब हम ओपनिंग करने उतरे तो मैं दुखी था लेकिन सहवाग ने कहा कि हम ये मुकाबला जीत सकते हैं। हमने अच्छी शुरूआत की और 12 ओवर में 82 रन बटोरे। मैंने सहवाग से कहा कि जब गेंदबाज नई गेंद से गेंदबाजी करे तो तुम्हें अपना विकेट गंवाना नहीं है और सिंगल लेने पर ध्यान देना है।”

पूर्व कप्तान ने कहा, “लेकिन जब रोनी ईरानी पहले ओवर में गेंदबाजी करने आए तो सहवाग ने पहली गेंद पर चौका जड़ा। मैं उनके पास गया और मैंने कहा कि हमें एक बाउंड्री मिल चुकी है और अब बस सिंगल लेना है। सहवाग ने मेरी बात नहीं सुनी और दूसरी गेंद पर भी चौका लगाया। इसके बाद तीसरे गेंद पर एक और चौका जड़ा। मैं काफी गुस्से में था। लेकिन उन्होंने फिर एक चौका लगाया। उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि सहवाग को रोकने का कोई सवाल नहीं उठता क्योंकि आक्रामक खेलना उनका तरीका है।”

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पूर्व कप्तान ने कहा कि मैन मैनेजमेंट कप्तानी करने का महत्वपूर्ण काम है और एक अच्छा कप्तान वो है जो खिलाड़ियों की सोच के साथ खुद को ढ़ाले। गांगुली ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू करने को अपने करियर का महत्वपूर्ण पल करार दिया।

गांगुली ने कहा, “मैं 1992 सीरीज को असफल नहीं मानता हूं। मुझे वहां खेलने का ज्यादा अवसर नहीं मिला। लेकिन इससे मुझे अच्छा क्रिकेटर बनने में मदद मिली। मैंने अगले तीन-चार साल ट्रेनिंग की और मानसिक तथा शारीरिक रूप से मजबूत बना।”

इसके बाद उन्होंने 1996 में लॉर्डस में टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू किया और अपने दोनों टेस्ट में शतक जड़ा। उन्होंने लॉडर्स में 131 और नॉटिंघम में 136 रन बनाए थे।

गांगुली ने कहा, “1996 में मैं मजबूत होकर वापस लौटा और स्कोर करने के तरीके सीखे तथा भारत के लिए 150 से ज्यादा मुकाबले खेले। लॉडर्स में मैंने बिना किसी दबाव के डेब्यू किया। 1992 से 1996 के दौरान मैं मजबूत बना और मेरी क्रिकेट तथा बल्लेबाजी की समझ बढ़ी। मैं हमेशा नर्वस रहता था। इससे सफलता में मदद मिलती है। असफलता जीवन का हिस्सा है। इससे बेहतर बनने में मदद मिलती है। सचिन तेंदुलकर भी नर्वस होते थे और दबाव कम करने के लिए हेडफोन्स का इस्तेमाल करते थे।”