जमशेदपुर के बरीडीह झुग्गी में रहने वाले 70 साल के स्वर्ण सिंह अपना पेट पालने के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं। लेकिन एक समय उन्होंने पेशेवर साइकलिस्ट बनने का सपना देखा था।

परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद, उन्होंने अपने पिता को अपने सपने पर भरोसा दिलाया और उसे पूरा करने के लिए मौका मांगा। रेस के लिए उपयुक्त साइकिल खरीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। लेकिन पैसा उनके सपनों के रास्ते की रुकावट नहीं बना।

अपने समर्पण और कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं जीती और अपनी अलग पहचान बनाई। राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने के बाद स्वर्ण 1970 के एशियाई खेलों में हिस्सा लेने के लिए बैंकॉक गए और मुकाबले में छठां स्थान हासिल किया।

अपना पेशेवर करियर खत्म करने के बाद स्वर्ण ने टाटा स्टील के साथ जमशेदपुर में एक वरिष्ठ खेल सहायक के रूप में काम करना शुरू किया। हालांकि उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि इस पद पर काम करने से उनकी आर्थिक स्थिति को कोई मदद नहीं मिल रही है जिसके बाद उन्होंने 1994 में अपना ट्रांसपोर्ट बिजनेस शुरू किया जो कि सफल भी हुआ।

लेकिन समय में बदलाव हुआ और 2005 में उन्हें बिजनेस में नुकसान होने लगा। इसलिए उन्हें कर्ज उतारने अपनी पैतृक संपत्ति भी बेचनी पड़ी। अब उनकी जिंदगी किसी पेशवर खिलाड़ी से कहीं अलग है।

इंडिया डॉट कॉम से बातचीत में उन्होंने अपनी स्थिति बयान की। उन्होंने कहा, “वित्तीय स्थिति ने मुझे ये काम करने के लिए मजबूर किया। मैं दिन में 12 घंटे काम करता हूं। शाम 6 बजे आया और सुबह 6 बजे निकल जाएगा। फिर मुझे खाना बनाना और सफाई करना है। जब तक सारे काम खत्म होते हैं तब तक सोने के लिए केवल दो घंटे बचे होते हैं।”

दिन के 12 घंटे गार्ड ड्यूटी कर स्वर्ण अपनी पत्नी और दो बच्चों (एक बेटी, एक बेटा) को पालते हैं। उनकी बड़ी बेटी को बोन टीबी है। उनकी 10,000 की मासिक कमाई में से 2,500 रूपए उनकी बेटी के इलाज में खर्च हो जाते हैं।

उनका बेटा जगराज सिंह भी नई दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता है। स्वर्ण ने बताया कि उनके बेटे जगराज को टाटा स्टील में नौकरी देने का वादा किया गया था लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास जरूरी योग्यता का अभाव था।

स्वर्ण से जब पूछा गया कि उन्होंने साइकिलिस्ट बनने का फैसला क्यों किया तो दुखी मन से उन्होंने कहा, “मेरे पिता परिवार के एकलौते कमाने वाले थे। मैं हमेशा जीवन में कुछ करना चाहता था जिससे उन्हें मुझ पर गर्व हो। लोग इधर-उधर साइकिल चलाते थे और मैं उन्हें गौर से देखता था। मुझे इसमें दिलचस्पी हुई।”

उन्होंने कहा, “मैंने अपने पिता से कहा कि मुझे रेसिंग साइकिल दिलाए लेकिन हमारे पास उसे खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।

इसलिए मैंने एक दिन, पेशेवर साइकिलिस्ट बनने की उम्मीद में साधारण साइकिल से अभ्यास करना शुरू कर दिया। पिता ने मुझे मेरी महत्वाकांक्षा के बारे में चेतावनी दी। कहा कि मेरा सपना सच नहीं होगा और दुख की कहानी बन जाएगा।”

अपने संघर्ष की कहानी बयान करते हुए स्वर्ण ने कहा, “रेसिंग साइकिल सस्ती नहीं होता। मैंने इटली से एक मंगवाने की कोशिश की। सबसे अच्छा मॉडल आपको सात लाख में मिलेगा। और एक साइकिल से काम नहीं चलता है। आपको अभ्यास और प्रतियोगिताओं के लिए कम से कम दो साइकिल चाहिए होंगी। हर किसी के पास पेशेवर साइकिल खरीदने के पैसे नहीं होते हैं। आपको अच्छी डाइट करनी पड़ती है जिसके लिए पैसों की जरूरत होती है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं 1970 के एशियाई खेलों का हिस्सा था। मैं तेहरान में होने वाले अगले सीजन के लिए भी चुना गया था लेकिन फंड ना होने की वजह से मैं जा ना सका। मैं म्यूनिख ओलंपिक के लिए चुना गया था, लेकिन सरकार ने कहा कि हमारे पास फंड नहीं है।”

स्पर्ण ने कहा, “समय गुजरता गया, मैं प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता रहा लेकिन मुझे खेल से कुछ नहीं मिला और सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली। सरकार की तरफ से किसी ने मुझसे संपर्क नहीं किया, इतने सालों में ये भी नहीं जानना चाहा कि मैं जिंदा हूं या मर गया।”

अपने सपने को इस तरह बिखरता देखने के बाद स्वर्ण ने अपने बच्चों को खेल जगत में आगे बढ़ने के लिए कभी प्रोत्साहित नहीं किया।