भारतीय सीमित ओवरों के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी © Getty Images
भारतीय सीमित ओवरों के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी © Getty Images

भारत ने न्यूजीलैंड के खिलाफ पांच मैचों की वनडे सीरीज 3-2 से अपने नाम की। धोनी की कप्तानी में भारत ने बेहतरीन खेल दिखाया और खेल के हर क्षेत्र में न्यूजीलैंड से सौ साबित हुए। हालांकि सीरीज काफी रोमांचक रही और शुरुआती चार मैचों के बाद सीरीज 2-2 की बराबरी पर थी। लेकिन फाइनल मैच में धोनी एंड कंपनी ने अपना शत प्रतिशत देते हुए टीम को भारी भरकम जीत दिला दी और एकतरफा अंदाज में जीत हासिल करते हुए सीरीज जीत ली। लेकिन क्या आपको पता है यह सीरीज टीम से ज्यादा धोनी के लिए महत्वपूर्ण थी। धोनी ने सीरीज जीतने के लिए एड़ी-चोटी तक का जोर लगा दिया और यहां तक की वह नंबर चार पर भी बल्लेबाजी करने उतर गए। अब सवाल उठता है कि अगर धोनी सीरीज हार जाते तो उनका क्या होता?, क्या सीरीज हारने पर उन्हें कप्तानी से हाथ धोना पड़ जाता?, क्या सीरीज में जीत उनके लिए संजीवनी बूटी की तरह है?, आइए इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं।

अगर सीरीज हार जाते एमएस धोनी:

धोनी ने काफी लंबे अरसे बाद टीम की कमान संभाली थी। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर धोनी ने टेस्ट से संन्यास ले लिया था। एमएस धोनी के संन्यास लेने पर चयनकर्ताओं ने विराट कोहली को टेस्ट टीम का कप्तान बना दिया था। जिसके बाद विराट कोहली की कप्तानी में भारत ने श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, वेस्टइंडीज, न्यूजीलैंड जैसी टीमों को धूल चटा दी। विराट कोहली की कप्तानी में टीम टेस्ट में नित नए रिकॉर्डों और कीर्तिमानों को छू रही थी। कोहली की कप्तानी में भारत ने अब तक एक भी टेस्ट सीरीज नहीं हारी है। ये भी पढ़ें: सौरव गांगुली की खोज हैं भारतीय टीम के ये पांच दिग्गज खिलाड़ी

कह सकते हैं विराट कोहली ने टेस्ट में टीम को नंबर एक तक पहुंचाया। विराट की कप्तानी को देखते हुए सब लोग उनसे प्रभावित होने लगे और उन्हें धोनी के उत्तराधिकारी के रूप में देखने लगे। न्यूजीलैंड के खिलाफ वनडे सीरीज से पहले ही कोहली की कप्तानी की तारीफें चरम पर थीं। क्रिकेट पंडितों ने तो यहां तक कह दिया कि वक्त आ गया है कि अब धोनी को कप्तानी का दारोमदार विरा कोहली के कंधों पर दे देना चाहिए, कई लोगों ने तो धोनी को संन्यास लेने की भी सलाह दे डाली।

हाल ही में पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली ने भी इस बात का समर्थन किया था कि अगर धोनी सीरीज हार जाते तो उनके लिए कप्तान बने रहना एक चुनौती होती और हो सकता था कि उन्हें कप्तानी से हाथ धोना पड़ता। धोनी के बतौर कप्तान पिछले दो साल के रिकॉर्डों की बात करें तो साल 2015 में धोनी की कप्तानी में टीम ने कुल 20 मैच खेले, जिनमें से 10 में टीम को जीत मिली और 9 मैचों में हार वहीं एक मैच का कोई नतीजा नहीं निकल सका। धोनी की जीत का प्रतिशत 43.75 फीसदी रहा। धोनी की जीत का प्रतिशत बांग्लादेश के कप्तान मशरफे मुर्ताजा से भी कम रहा। आंकड़ों से साफ है कि हार जीत के बीच ज्यादा अंतर नहीं था।

वहीं साल 2016 की बात करें तो धोनी की कप्तानी में टीम ने 13 मैच खेले जिनमें से टीम को 7 में जीत और 6 में हार का सामना करना पड़ा। धोनी की जीत का प्रतिशत 53.84 फीसदी रहा। एक बार फिर जीत-हार के अंतर में सिर्फ एक मैच का ही अंतर रहा। कह सकते हैं धोनी की कप्तानी में टीम जीत तो रही है लेकिन प्रदर्शन में कहीं न कहीं कमी देखी जा सकती है। साफ है अगर टीम को न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज में हार का सामना करना पड़ता तो धोनी के लिए कप्तान के पद पर बने रहना टेढ़ी खीर के समान होता जबकि कोहली की कप्तानी में टीम बहुत बेहतरीन खेल दिखा रही है।

धोनी के लिए संजीवनी क्यों है कीवियों के खिलाफ जीत:

टीम ने कीफी लंबे समय के बाद वनडे मैच खेला और धोनी को कप्तानी करने का मौका मिला। एमएस धोनी ने इन सब दबावों के बीच टीम को सीरीज 3-2 से जितवा दी। सीरीज में धोनी ने कप्तानी भी अच्छी की और बल्ले से भी प्रदर्शन अच्छा रहा। ऐसे में धोनी ने उन सब सवालों के मुंहतोड़ जवाब दे दिए। धोनी ने उन सबके मुंह पर तमाचा जड़ दिया जो उनकी कप्तानी और बल्लेबाजी पर सवला खड़े कर रहे थे। कीवी टीम के खिलाफ धोनी की जीत ने उन्हें खुद को साबित करने का मौका दे दिया। भारत को फिलहाल टेस्ट मैच ज्यादा खेलने हैं। पहले इंग्लैंड, फिर बांग्लादेश और फिर ऑस्ट्रेलिया। ऐसे में धोनी के पास टीम की कमान संभालने का ज्यादा मौका नहीं होगा। टेस्ट में भारत की कमान विराट कोहली के हाथों में है। धोनी ने कीवियों के खिलाफ जीत दर्ज करके कम से कम यह साबित कर दिया कि वह अभी भी उतने ही चतुर कप्तान हैं। ऐसे में धोनी पर सवाल खड़ा करने वालों को उन्होंने अपनी कप्तानी से जबाव दे दिया। अब धोनी कम से कम आगामी मैचों, चैंपियंस ट्रॉफी तक टीम के कप्तान बने रहेंगे।