दूसरे टेस्ट में न्यूजीलैंड को हराकर नंबर 1 टीम बनी इंडिया   © AFP
दूसरे टेस्ट में न्यूजीलैंड को हराकर नंबर 1 टीम बनी इंडिया © AFP

जस्टिस लोढ़ा समिति ने हाल ही में बीसीसीआई के द्वारा सिफारिशों को लागू न किए जाने और वित्तीय अदायगी जारी रखने के कारण बोर्ड के सभी बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए हैं। इस निर्णय के कारण बीसीसीआई समेत पूरे भारतीय क्रिकेट जगत में भूचाल सा आ गया है। ऐसी परिस्थिति में बीसीसीआई ने साफतौर पर कह दिया है कि उनके पास सीरीज को रद्द करने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा है क्योंकि उनके बैंकों ने बीसीसीआई अकाउंट को फ्रीज करने का निश्चिय कर लिया है। एक बीसीसीआई अधिकारी ने कहा, “हम नहीं चाहते कि भारत दुनियाभर के सामने अपमानित हो। हम कैसे फंक्शन करेंगे। हम कैसे किसी मैच का आयोजन करेंगे। हम कैसे भुगतान करेंगे? अकाउंट को फ्रीज करना कोई मजाक नहीं है। एक अंतरराष्ट्रीय टीम यहां है और बहुत कुछ दाव पर लगा हुआ है।” ऐसे में सवाल पैदा होता है कि आखिर कोर्ट को ये बैंक अकाउंट फ्रीज क्यों करने पड़े। इसके लिए आपको इस मामले की तह तक जाना होगा। तो आइए आपको हम बताते हैं पूरी इनसाइड स्टोरी।

यह बात साल 2013 से शुरू होती है जब आईपीएल में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग का खुलासा होने के कारण बीसीसीआई समेत कई बिजनेसमैनों पर सवाल तल्ख हो गए थे। इसकी जांच के लिए मुद्गल समिति को बनाया गया और इस समिति ने अगस्त 2014 को अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी। इसके बाद साल 2015 जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता और सुधार लाने के लिए पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा की अगुआई में एक नई समिति बनाई। इस समिति ने अपनी सबसे अहम रिपोर्ट को जनवरी 2016 में सौंपा। यह रिपोर्ट कुल 159 पन्नों की थी जिसमें कुल 9 मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं। ये भी पढ़ें: बौखलाया बीसीसीआई, रद्द करेगा भारत- न्यूजीलैंड सीरीज

1. लोढ़ा समिति की सबसे अहम सिफारिश है कि एक राज्य में एक ही क्रिकेट संघ हो जो पूर्ण सदस्य हो और जिसे वोट देने का अधिकार हो। इसने यह भी कहा है कि रेलवे, सर्विसेज और यूनिवर्सिटियों की अहमियत घटाकर उन्हें एसोसिएट सदस्य का दर्जा देना चाहिए।

2. समिति का यह भी मानना है कि आईपीएल और बीसीसीआई की गवर्निंग बॉडीज अलग-अलग होनी चाहिए। इसने आईपीएल की गवर्निंग समिति के लिए सीमित स्वायत्तता की सिफारिश की है। बीसीसीआई पदाधिकारियों की योग्यता के मानदंड बनाए जाने चाहिए। पदाधिकारी बनने के लिए यह जरूरी होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति वह मंत्री या सरकारी अधिकारी नहीं होना चाहिए

3. समिति के मुताबिक बीसीसीआई पदाधिकारियों की योग्यता के मानदंड बनाए जाने चाहिए। पदाधिकारी बनने के लिए यह जरूरी होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति मंत्री या सरकारी अधिकारी न हो और यह भी कि उसने बीसीसीआई में किसी पद पर नौ साल या तीन कार्यकाल न गुजारे हों। समिति का यह भी कहना है कि किसी भी बीसीसीआई पदाधिकारी को लगातार दो बार से ज्यादा का कार्यकाल नहीं मिलना चाहिए।

4. समिति ने यह भी कहा है कि सट्टेबाजी को वैध बना दिया जाना चाहिए जिसके लिए भीतर से ही कोई व्यवस्था हो।

5. रिपोर्ट में यह भी प्रस्ताव है कि खिलाड़ियों की अपनी एक असोसिएशन बने।

6. समिति ने एक स्टीयरिंग कमेटी बनाने की सिफारिश भी की है जिसके अध्यक्ष पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई हों और मोहिंदर अमरनाथ, डायना इदुलजी और अनिल कुंबले उसके सदस्य हों।

रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड में क्रिकेट संबंधी मसलों को निपटाने की जिम्मेदारी पूर्व खिलाड़ियों को दी जानी चाहिए। साथ ही एक ‘एथिक्स ऑफिसर’ हो जो हितों के टकराव संबंधी मामलों पर फैसला करे।

7. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एक ‘एथिक्स ऑफिसर’ हो जो हितों के टकराव संबंधी मामलों पर फैसला करे।

8. समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि बीसीसीआई को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाया जाना चाहिए।

9. रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड में क्रिकेट संबंधी मसलों को निपटाने की जिम्मेदारी पूर्व खिलाड़ियों को दी जानी चाहिए जबकि इससे इतर मामले संभालने के लिए सीईओ, उसके छह सहायक मैनजरों और दो समितियों वाली एक व्यवस्था हो।

लोढ़ा समिति ने बहुत पहले ही बीसीसीआई को सिफारिशें लागू करने के लिए कह दिया था। जिसे बार-बार बीसीसीआई टाल रहा था। अंततः कोर्ट ने बीसीसीआई को सिफारिशें लागू करने के लिए अंतिम तारीख 30 सितंबर मुकम्मल की थी लेकिन बीसीसीआई ने तय तारीख को भी सिफारिशें लागू करने पर कोई फैसला नहीं लिया। जिसके बाद कोर्ट की स्पेशल बेंच ने बीसीसीआई को खूब खरी खोटी सुनाई थी और कहा था कि सिफारिशें लागू न करने के खराब परिणाम होंगे। कोर्ट ने इस संबंध में बीसीसीआई को अपनी बात रखने के लिए 6 अक्टूबर तक का समय दिया है।

इसी बीच कोर्ट के कहने पर बैंकों ने बीसीसीआई के बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए हैं जिससे धर्मसंकट खड़ा हो गया है। बोर्ड ने इस कठोर कदम को उठाने का फैसला उस वक्त लिया जब लोढ़ा पैनल ने बैंक को लेटर जारी किया, जिसमें उनसे कहा गया था कि बीसीसीआई को फंड न दिया जाए। लेटर में बताया गया है, “समिति के नोटिस में यह बात आई की 30 सितंबर को बीसीसीआई की ‘इमर्जेंट वर्किंग कमिटी’ में कुछ निर्णय लिए गए जिसमें विभिन्न संघों के सदस्यों के बड़े धन को चुकाने की बात की गई।”

इसमें आगे कहा गया है, “जैसा कि स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक गुरुवार 6.10.2016 को रखी जाएगी, आपको ये निर्देश दिए जाते हैं कि वित्तीय अदायगी की ओर कोई कदम न बढ़ाएं जो 31.08.2016 की तीराख को अनुमोदित/सुलझाया गया था। इस निर्देश का कोई भी उल्लंघन उचित निर्देश के लिए सुप्रीम कोर्ट के आगे रखा जाएगा”।

लेटर बीसीसीआई सचिव अजय शिर्के, सीईओ राहुल जौहरी और कोषाध्यक्ष अनिरुद्ध चौधरी के नाम पर भी लिखा गया था। समिति ने कहा, “आपको पता है कि समिति के 31.8.2016 के मुताबिक, आगे के निर्णय नहीं लिए जा सकते, रुटीन मामलों को छोड़कर। इस राशि की अदायगी रुटीन नहीं है और किसी भी मामले में आकस्मिक नहीं है।”

पैनल काफी गुस्से में था क्योंकि बोर्ड ने समिति की सिफारिशों को लागू करने की पहली तारीख मिस कर दी थी। “आप इसे भी जानते हैं कि बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के उल्लंघन को चुना साथ ही समिति द्वारा पहले सेट की टाइमलाइन का भी उल्लंघन किया जिसमें वित्त अदायगी पॉलिसी शामिल थी जिसे 30.9.2016 तक फ्रेम किया जाना था।”